Chapter-पृथ्वी एक तंत्र: ऊर्जा, द्रव्य और जीवन Science Exploration class 9 in hindi Medium CBSE Notes
CBSE Class 9 Science Exploration Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.
पृथ्वी एक तंत्र: ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
Chapter Review and Key Points
अध्याय 13. पृथ्वी एक तंत्र — ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
Chapter Review
इस अध्याय में पृथ्वी को एक परस्पर संबद्ध तंत्र के रूप में समझाया गया है, जिसमें ऊर्जा और द्रव्य का निरंतर प्रवाह होता रहता है। पृथ्वी के विभिन्न मंडल एक-दूसरे के साथ निरंतर अंतःक्रिया करते हैं और इनमें होने वाला परिवर्तन दूसरे मंडलों को भी प्रभावित करता है।
1. पृथ्वी एक तंत्र
- पृथ्वी तंत्र – पृथ्वी के विभिन्न भौतिक, रासायनिक और जैविक घटकों का परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र।
- ऊर्जा का प्रमुख स्रोत – सूर्य पृथ्वी के लिए ऊर्जा का मुख्य बाहरी स्रोत है।
- द्रव्य का प्रवाह – जल, कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन जैसे पदार्थ पृथ्वी के विभिन्न घटकों के बीच चक्रित होते रहते हैं।
- परस्पर निर्भरता – एक मंडल में परिवर्तन होने पर दूसरे मंडलों में भी परिवर्तन हो सकता है।
2. पृथ्वी के प्रमुख मंडल
- भूमंडल (Geosphere) – ठोस चट्टानें, मिट्टी, भू-आकृतियाँ तथा पृथ्वी का आंतरिक भाग।
- जलमंडल (Hydrosphere) – महासागर, नदियाँ, झीलें और भूजल सहित पृथ्वी पर पाया जाने वाला द्रव जल।
- हिममंडल (Cryosphere) – हिम और बर्फ के रूप में पाया जाने वाला जल।
- वायुमंडल (Atmosphere) – पृथ्वी के चारों ओर उपस्थित गैसों का आवरण।
- जैवमंडल (Biosphere) – सभी जीवित जीव और उनके आवास।
- मंडलों की अंतःक्रिया – ये सभी मंडल स्वतंत्र नहीं हैं बल्कि ऊर्जा और द्रव्य के आदान-प्रदान द्वारा जुड़े हुए हैं।
3. एक मंडल में परिवर्तन का प्रभाव
- हिमपात में कमी – झीलों के जल स्तर में कमी और घास की उपलब्धता में कमी ला सकती है।
- अरब सागर का गर्म होना – वाष्पीकरण बढ़ाकर दक्षिण-पश्चिम मानसून को प्रभावित कर सकता है।
- हिमनदों का पिघलना – निचले क्षेत्रों में बाढ़ तथा भविष्य में समुद्र के जल स्तर में वृद्धि का कारण बन सकता है।
- पर्यावास की हानि – जलवायु और भौतिक परिवर्तनों से जैवमंडल प्रभावित हो सकता है।
4. पृथ्वी का असमान ऊष्मीकरण
- सौर विकिरण – सूर्य से विद्युत चुंबकीय तरंगों के रूप में पृथ्वी तक पहुँचने वाली ऊर्जा।
- प्रकाश का वेग – निर्वात में विद्युत चुंबकीय विकिरण लगभग 3 × 108 m/s की गति से चलता है।
- विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम – इसमें गामा किरणों से लेकर रेडियो तरंगों तक विभिन्न प्रकार के विकिरण शामिल हैं।
- सौर ऊर्जा के प्रमुख क्षेत्र – पृथ्वी तक पहुँचने वाली सौर ऊर्जा मुख्यतः पराबैंगनी, दृश्य और अवरक्त विकिरण के रूप में होती है।
- दृश्य प्रकाश – प्रकाश संश्लेषण के लिए ऊर्जा प्रदान करता है और पृथ्वी की सतह को गर्म करता है।
- अवरक्त विकिरण – पृथ्वी की सतह को गर्म करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- पराबैंगनी विकिरण – अधिक ऊर्जा वाला विकिरण है और इसकी अधिक मात्रा जीवों के लिए हानिकारक हो सकती है।
- ओजोन परत – सूर्य की हानिकारक UV किरणों के बड़े भाग को अवशोषित करके पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।
5. सूर्यताप और सौर स्थिरांक
- सूर्यताप (Insolation) – पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाले सौर विकिरण की मात्रा।
- सौर स्थिरांक – वायुमंडल के ऊपरी भाग पर सूर्य की किरणों के लंबवत प्रति इकाई क्षेत्रफल और प्रति इकाई समय प्राप्त औसत सौर ऊर्जा।
- सौर स्थिरांक का मान – लगभग 1.4 kW m−2 या लगभग 1400 J s−1 m−2।
- भारत में सूर्यताप – भारत की भौगोलिक स्थिति के कारण यहाँ सौर ऊर्जा की पर्याप्त संभावना है।
6. सौर विकिरण और पृथ्वी की सतह
- अवशोषण – विभिन्न पदार्थ सौर विकिरण को अलग-अलग मात्रा में अवशोषित करते हैं।
- गहरे रंग की सतह – अधिक सौर ऊर्जा अवशोषित करती है और जल्दी गर्म होती है।
- हल्के रंग की सतह – अधिक विकिरण परावर्तित करती है और अपेक्षाकृत ठंडी रहती है।
- अल्बिडो (Albedo) – किसी सतह द्वारा परावर्तित सौर विकिरण का अनुपात।
- उच्च अल्बिडो – अधिक विकिरण परावर्तित होने के कारण सतह अपेक्षाकृत ठंडी रहती है।
- निम्न अल्बिडो – अधिक विकिरण अवशोषित होने के कारण सतह अपेक्षाकृत गर्म रहती है।
- हिम और बर्फ – उच्च अल्बिडो वाली सतहें हैं।
- काली मिट्टी और महासागरीय जल – अपेक्षाकृत निम्न अल्बिडो वाली सतहें हैं।
7. शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव
- शहरी ऊष्मा द्वीप – शहरों का आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म होना।
- मुख्य कारण – इस्पात, कंक्रीट, ईंट, डामर और अन्य सतहों द्वारा सौर ऊर्जा का अधिक अवशोषण।
- शहरी वनस्पति की कमी – शहरों में प्राकृतिक शीतलन कम कर सकती है।
- पादप वाष्पोत्सर्जन – ग्रामीण क्षेत्रों और वनों को अपेक्षाकृत ठंडा रखने में सहायता करता है।
8. अक्षांश और पृथ्वी का आकार
- पृथ्वी का गोलाकार आकार – सूर्य की किरणें अलग-अलग अक्षांशों पर अलग-अलग कोणों से पड़ती हैं।
- भूमध्यरेखीय क्षेत्र – सौर ऊर्जा छोटे क्षेत्र में केंद्रित होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक गर्म रहता है।
- ध्रुवीय क्षेत्र – सौर ऊर्जा बड़े क्षेत्र में फैलने के कारण अपेक्षाकृत ठंडे रहते हैं।
- असमान ऊष्मीकरण – पृथ्वी पर तापमान के अंतर का प्रमुख कारण है।
- ऋतुओं का परिवर्तन – पृथ्वी की धुरी के झुकाव और सूर्य के चारों ओर परिक्रमा से संबंधित है।
- वैश्विक पवन और महासागरीय धाराएँ – पृथ्वी की सतह के असमान ऊष्मीकरण से संचालित होती हैं।
9. वायुमंडल
- वायुमंडल – पृथ्वी के चारों ओर गैसों का आवरण।
- मुख्य गैसें – लगभग 78% नाइट्रोजन और 21% ऑक्सीजन तथा थोड़ी मात्रा में अन्य गैसें।
- क्षोभमंडल – लगभग 0–12 km; अधिकांश मौसम संबंधी घटनाएँ इसी परत में होती हैं।
- क्षोभमंडल में तापमान – ऊँचाई बढ़ने के साथ सामान्यतः घटता है।
- समतापमंडल – लगभग 12–50 km; इसमें ओजोन परत स्थित है।
- ओजोन परत – UV विकिरण को अवशोषित करके वायुमंडल को गर्म करती है और जीवन की रक्षा करती है।
- मध्य मंडल, तापमंडल और बहिर्मंडल – वायुमंडल की ऊपरी परतें हैं।
10. हरितगृह प्रभाव
- हरितगृह प्रभाव – वायुमंडल की कुछ गैसों द्वारा पृथ्वी से निकलने वाली ऊष्मा को अवशोषित करने की प्रक्रिया।
- प्रमुख हरितगृह गैसें – कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और जलवाष्प।
- प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव – पृथ्वी का ताप जीवन के लिए अनुकूल बनाए रखने में सहायक है।
- अतिरिक्त CO2 – मानवीय गतिविधियों से CO2 बढ़ने पर हरितगृह प्रभाव और वैश्विक ताप में वृद्धि हो सकती है।
- शुक्र ग्रह – उसके वायुमंडल में अनियंत्रित हरितगृह प्रभाव के कारण बुध से भी अधिक गर्म है।
11. वायुदाब और पवन
- वायुदाब – वायुमंडलीय वायु द्वारा लगाया गया दबाव।
- असमान ऊष्मीकरण – पृथ्वी पर अलग-अलग क्षेत्रों में ताप और वायुदाब के अंतर उत्पन्न करता है।
- पवन – वायु का उच्च दाब से निम्न दाब की ओर गति करना।
- ग्रहीय पवन – भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच असमान ऊष्मीकरण से उत्पन्न बड़े पैमाने की वायु परिसंचरण व्यवस्था।
- भूमध्यरेखीय निम्न दाब पट्टी – तीव्र ऊष्मीकरण से गर्म वायु ऊपर उठती है।
- उपोष्ण उच्च दाब पट्टियाँ – लगभग 30° उत्तर और दक्षिण अक्षांशों पर नीचे उतरती वायु से बनती हैं।
12. महासागरीय धाराएँ
- महासागरीय धाराएँ – महासागरों में जल का बड़े पैमाने पर नियमित प्रवाह।
- ऊष्मा का परिवहन – महासागरीय धाराएँ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर ऊष्मा का स्थानांतरण करती हैं।
- जलवायु पर प्रभाव – महासागरीय धाराएँ विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु को प्रभावित करती हैं।
- जल की लवणता और घनत्व – महासागरीय जल के ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज प्रवाह को प्रभावित करते हैं।
- महासागरीय भंवर (Gyres) – पृथ्वी के घूर्णन और महासागरीय प्रवाह से बनने वाले विशाल वृत्ताकार प्रवाह पैटर्न।
13. जल चक्र
- जल चक्र – पृथ्वी के जलमंडल, वायुमंडल, भूमंडल और जैवमंडल के बीच जल का निरंतर संचलन।
- वाष्पीकरण – जल का द्रव अवस्था से जलवाष्प में परिवर्तन।
- वाष्पोत्सर्जन – पौधों द्वारा जलवाष्प का वायुमंडल में छोड़ा जाना।
- संघनन – जलवाष्प का ठंडा होकर जल की छोटी बूंदों में बदलना।
- वर्षण – बादलों से जल का वर्षा या अन्य रूपों में पृथ्वी पर गिरना।
- अपवाह – भूमि की सतह पर जल का बहकर नदियों और अन्य जल स्रोतों तक पहुँचना।
- भूजल – भूमि के अंदर संचित जल।
14. जैव-भूरासायनिक चक्र
- जैव-भूरासायनिक चक्र – जैविक और अजैविक घटकों के बीच द्रव्य तथा आवश्यक तत्वों का चक्रीय संचलन।
- महत्त्व – कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन जैसे आवश्यक तत्वों को पुनः उपलब्ध कराता है।
- जैविक घटक – पौधे, जन्तु और सूक्ष्मजीव।
- अजैविक घटक – वायु, जल, मिट्टी और चट्टानें।
15. कार्बन चक्र
- कार्बन का महत्त्व – कार्बन प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और DNA जैसे जैविक अणुओं का आवश्यक घटक है।
- कार्बन का भंडार – वायुमंडल, जैवमंडल, भूमंडल और जलमंडल में कार्बन विभिन्न रूपों में पाया जाता है।
- प्रकाश संश्लेषण – पौधे वायुमंडलीय CO2 का उपयोग करके कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं।
- श्वसन – जीव CO2 को वापस वायुमंडल में छोड़ते हैं।
- अपघटन – मृत जीवों के अपघटन से कार्बन पुनः पर्यावरण में पहुँचता है।
- जीवाश्म ईंधन – लंबे समय तक कार्बन के भंडारण का एक रूप हैं।
16. नाइट्रोजन चक्र
- नाइट्रोजन का महत्त्व – प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों के निर्माण के लिए आवश्यक तत्व।
- नाइट्रोजन का प्रमुख भंडार – वायुमंडल में नाइट्रोजन गैस के रूप में।
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण – वायुमंडलीय नाइट्रोजन को उपयोगी यौगिकों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया।
- स्वांगीकरण (Assimilation) – पौधों द्वारा नाइट्रोजन यौगिकों का अवशोषण और उपयोग।
- अमोनीकरण – जैविक पदार्थों से अमोनिया या अमोनियम यौगिकों का निर्माण।
- नाइट्रीकरण – अमोनिया/अमोनियम यौगिकों का नाइट्राइट और नाइट्रेट में परिवर्तन।
- विनाइट्रीकरण – नाइट्रेट से नाइट्रोजन गैस का निर्माण और उसका वायुमंडल में लौटना।
17. ऑक्सीजन चक्र
- ऑक्सीजन – वायुमंडल का लगभग 21% भाग मुक्त ऑक्सीजन गैस से बना है।
- जैविक महत्त्व – ऑक्सीजन अनेक जैविक अणुओं और जीवों की जीवन प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक है।
- प्रकाश संश्लेषण – वायुमंडल में ऑक्सीजन की पुनःपूर्ति का प्रमुख माध्यम है।
- श्वसन – जीव ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं।
18. जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी तंत्र
- जलवायु परिवर्तन – पृथ्वी के तापमान और प्राकृतिक प्रक्रियाओं में दीर्घकालिक परिवर्तन उत्पन्न कर सकता है।
- जल चक्र पर प्रभाव – तापमान में परिवर्तन वाष्पीकरण, वर्षण और जल की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है।
- हिममंडल पर प्रभाव – बढ़ता तापमान हिमनदों और बर्फ के पिघलने की दर बढ़ा सकता है।
- महासागरों पर प्रभाव – तापमान और घुली हुई CO2 की मात्रा में परिवर्तन समुद्री जीवन को प्रभावित कर सकता है।
- जैवमंडल पर प्रभाव – पर्यावास, पारितंत्र और जीवों के वितरण में परिवर्तन हो सकते हैं।
19. पृथ्वी तंत्र का संतुलन
- पृथ्वी एक परस्पर संबद्ध तंत्र है – ऊर्जा प्रवाह और पदार्थों के चक्र विभिन्न मंडलों को आपस में जोड़ते हैं।
- प्राकृतिक संतुलन – पृथ्वी के विभिन्न मंडलों और चक्रों के बीच निरंतर अंतःक्रिया से बना रहता है।
- मानवीय गतिविधियाँ – प्राकृतिक चक्रों और ऊर्जा संतुलन में व्यवधान उत्पन्न कर सकती हैं।
- सतत जीवनशैली – ऊर्जा बचाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से पृथ्वी तंत्र पर दबाव कम किया जा सकता है।
- मिशन LiFE – ऊर्जा बचत और संसाधनों के संरक्षण जैसी सरल जीवनशैली अपनाने के माध्यम से सतत भविष्य की दिशा में व्यक्तिगत एवं सामुदायिक प्रयासों पर बल देता है।
एक नजर में पूरा अध्याय
- सूर्य → ऊर्जा का प्रमुख स्रोत
- पृथ्वी → ऊर्जा और द्रव्य का गतिशील तंत्र
- भूमंडल → ठोस पृथ्वी और चट्टानें
- जलमंडल → पृथ्वी का जल
- हिममंडल → हिम और बर्फ
- वायुमंडल → गैसों का आवरण
- जैवमंडल → जीव और उनके आवास
- असमान ऊष्मीकरण → पवन और महासागरीय धाराओं का आधार
- अल्बिडो → सतह द्वारा सौर विकिरण का परावर्तन
- वायुमंडल → मौसम, जलवायु और जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण
- ओजोन परत → UV विकिरण से सुरक्षा
- हरितगृह प्रभाव → पृथ्वी के तापमान को प्रभावित करता है
- जल चक्र → पृथ्वी पर जल का निरंतर संचलन
- कार्बन चक्र → कार्बन का जैविक और अजैविक घटकों के बीच संचलन
- नाइट्रोजन चक्र → नाइट्रोजन का पुनर्चक्रण
- ऑक्सीजन चक्र → ऑक्सीजन का निरंतर संचलन
- मानवीय गतिविधियाँ → पृथ्वी तंत्र के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं
- सतत जीवनशैली → पृथ्वी के संसाधनों और संतुलन के संरक्षण में सहायक
इस पाठ के अन्य दुसरे विषय भी देखे :
1. Chapter Review and Key Points
3. सौर विकिरण, अल्बिडो और असमान ऊष्मीकरण
4. वायुमंडल, उसकी परतें, ओजोन और हरितगृह प्रभाव
5. ग्रहीय पवन और महासागरीय धाराएँ
6. जैव-भूरासायनिक चक्र जल चक्र और कार्बन चक्र
7. नाइट्रोजन चक्र और ऑक्सीजन चक्र
Class 9, all subjects CBSE Notes in hindi medium, cbse class 9 Science Exploration notes, class 9 Science Exploration notes hindi medium, cbse 9 Science Exploration cbse notes, class 9 Science Exploration revision notes, cbse class 9 Science Exploration study material, ncert class 9 science notes pdf, class 9 science exam preparation, cbse class 9 physics chemistry biology notes
Welcome to ATP Education
ATP Education