Chapter-ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग Science Exploration class 9 in hindi Medium CBSE Notes
CBSE Class 9 Science Exploration Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.
ध्वनि तरंगें अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
स्वर (Tone)
अध्याय 10. ध्वनि तरंगें—अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
ध्वनि की पहचान केवल उसकी आवृत्ति और आयाम से ही नहीं होती। अलग-अलग स्रोतों से उत्पन्न ध्वनियाँ समान आवृत्ति और प्रबलता होने पर भी अलग सुनाई दे सकती हैं। ध्वनि के इस अंतर को समझने के लिए स्वर, मूल आवृत्ति, अधिस्वरक, ध्वनि-गुणता और अष्टक जैसे concepts को समझना आवश्यक है।
स्वर (Tone)
परिभाषा: लगभग एकल आवृत्ति वाली ध्वनि को स्वर (Tone) कहते हैं।
हमारे दैनिक जीवन में सुनाई देने वाली अधिकांश ध्वनियाँ केवल एक आवृत्ति की नहीं होतीं, बल्कि अनेक आवृत्तियों का मिश्रण होती हैं। लगभग एकल आवृत्ति की ध्वनि प्राप्त करने के लिए स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork) या सीटी का उपयोग किया जा सकता है।
स्वरित्र द्विभुज और स्वर
स्वरित्र द्विभुज एक U-आकार की धातु की छड़ होती है, जिसमें दो शाखाएँ होती हैं। इसे रबड़ के पैड से हल्के से टकराने पर इसकी शाखाएँ कंपन करने लगती हैं और एक लगभग एकल आवृत्ति की ध्वनि उत्पन्न होती है।
स्वरित्र द्विभुज की अलग-अलग आवृत्तियों वाले मॉडल अलग-अलग स्वर उत्पन्न करते हैं। इसलिए किसी स्वर की पहचान उसकी आवृत्ति से की जा सकती है।
संगीत का स्वर
संगीत में प्रयुक्त ध्वनि सामान्यतः केवल एक आवृत्ति की नहीं होती। किसी वाद्ययंत्र या मानव आवाज से उत्पन्न संगीत के स्वर में एक मूल आवृत्ति के साथ अन्य उच्च आवृत्तियाँ भी उपस्थित हो सकती हैं।
मूल आवृत्ति (Fundamental Frequency)
परिभाषा: किसी संगीत स्वर में उपस्थित सबसे कम आवृत्ति को मूल आवृत्ति (Fundamental Frequency) कहते हैं।
मूल आवृत्ति स्वर की मुख्य आवृत्ति होती है और स्वर के तारत्व से इसका महत्वपूर्ण संबंध होता है।
अधिस्वरक (Overtones)
परिभाषा: मूल आवृत्ति के अतिरिक्त उपस्थित उच्चतर आवृत्तियों को अधिस्वरक (Overtones) कहते हैं।
किसी संगीत स्वर में मूल आवृत्ति के साथ विभिन्न अधिस्वरकों का मिश्रण होता है। इनकी संख्या और सापेक्ष तीव्रता ध्वनि की प्रकृति को प्रभावित करती है।
ध्वनि-गुणता (Timbre)
परिभाषा: समान स्वर और समान प्रबलता वाली दो ध्वनियों को अलग-अलग पहचानने में सहायता करने वाले ध्वनि के विशिष्ट गुण को ध्वनि-गुणता (Timbre) कहते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि एक ही स्वर को सितार और बाँसुरी दोनों से समान प्रबलता के साथ बजाया जाए, तब भी दोनों की ध्वनियाँ अलग सुनाई देंगी। इसका कारण उनकी ध्वनि-गुणता में अंतर है।
ध्वनि-गुणता मुख्यतः ध्वनि में उपस्थित मूल आवृत्ति और विभिन्न अधिस्वरकों के मिश्रण पर निर्भर करती है। वाद्ययंत्र का आकार, उसका पदार्थ और उसकी संरचना अधिस्वरकों के प्रतिरूप को प्रभावित करते हैं।
ध्वनि-गुणता का महत्त्व
- यह अलग-अलग स्रोतों की ध्वनियों को पहचानने में सहायता करती है।
- इसी कारण समान स्वर वाले अलग-अलग वाद्ययंत्रों की ध्वनि अलग सुनाई देती है।
- मानव आवाज को पहचानने में भी ध्वनि-गुणता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- संगीत में अलग-अलग वाद्ययंत्रों की विशिष्ट ध्वनि उनके अधिस्वरकों के कारण बनती है।
तारत्व, प्रबलता और ध्वनि-गुणता
| विशेषता | मुख्य संबंध | सरल अर्थ |
|---|---|---|
| तारत्व (Pitch) | आवृत्ति | ध्वनि कितनी तीखी या गंभीर सुनाई देती है |
| प्रबलता (Loudness) | आयाम | ध्वनि कितनी तेज या धीमी सुनाई देती है |
| ध्वनि-गुणता (Timbre) | मूल आवृत्ति और अधिस्वरकों का मिश्रण | दो ध्वनियों को अलग पहचानने का गुण |
अष्टक (Octave)
परिभाषा: ऐसे दो समान स्वरों के बीच का अंतराल जिनकी मूल आवृत्तियों में 2 : 1 का अनुपात हो, अष्टक (Octave) कहलाता है।
यदि किसी स्वर की मूल आवृत्ति 200 Hz है, तो उसकी दो गुनी अर्थात 400 Hz की आवृत्ति वाला समान स्वर उससे एक अष्टक ऊपर होगा।
उदाहरण:
200 Hz → 400 Hz
400 Hz → 800 Hz
अर्थात जब मूल आवृत्ति दो गुनी हो जाती है, तो एक अष्टक का अंतर प्राप्त होता है।
संगीत में आवृत्ति का महत्त्व
संगीत के प्रत्येक स्वर की एक विशिष्ट आवृत्ति होती है। अलग-अलग स्वरों की आवृत्तियाँ अलग होने के कारण वे अलग सुनाई देते हैं। सामान्यतः ‘सा’ स्वर की आवृत्ति अन्य क्रमिक स्वरों की तुलना में कम होती है और आगे के स्वरों में आवृत्ति बढ़ती जाती है।
किसी स्वर की आवृत्ति को मापने के लिए ध्वनि की आवृत्ति पहचानने वाले उपकरण या मोबाइल ऐप का उपयोग किया जा सकता है। ऐसे उपकरण ध्वनि के आवृत्ति घटकों को Hz में प्रदर्शित कर सकते हैं।
वाद्ययंत्रों से ध्वनि का निर्माण
विभिन्न वाद्ययंत्रों में अलग-अलग भाग कंपन करके ध्वनि उत्पन्न करते हैं। वाद्ययंत्र की संरचना और कंपन करने वाले भागों के कारण उससे उत्पन्न ध्वनि की विशेषताएँ अलग होती हैं।
तार वाद्ययंत्र
तार वाद्ययंत्रों में तने हुए तार कंपन करके ध्वनि उत्पन्न करते हैं। सितार, वीणा और सारंगी जैसे वाद्ययंत्रों में तारों के कंपन को उपयोगी ध्वनि में परिवर्तित किया जाता है।
वायु वाद्ययंत्र
वायु वाद्ययंत्रों में वायु के स्तंभ के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। बाँसुरी इसका एक उदाहरण है। वाद्ययंत्र की लंबाई और उसके अंदर वायु के कंपन से उत्पन्न आवृत्तियाँ ध्वनि को प्रभावित करती हैं।
ताल वाद्ययंत्र
ताल वाद्ययंत्रों में खिंची हुई झिल्ली या अन्य भाग के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है। तबला और मृदंगम इसके उदाहरण हैं।
तबला और ‘स्याही’
तबले के ढोल-शीर्ष पटल के मध्य भाग में लगाया गया काला पदार्थ ‘स्याही’ कहलाता है। यह पटल के कंपन को प्रभावित करता है और वाद्ययंत्र को विशिष्ट तथा समृद्ध ध्वनि उत्पन्न करने में सहायता करता है।
तबले की ध्वनि केवल एक आवृत्ति की नहीं होती। इसके कंपन से अनेक आवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं और इनके उचित संयोजन से विशिष्ट संगीत स्वर प्राप्त होता है।
भारतीय वाद्ययंत्रों में ध्वनि की समृद्धता
सारंगी, सितार और वीणा जैसे भारतीय तार वाद्ययंत्रों में विभिन्न आवृत्तियों के संयोजन को समृद्ध बनाने के लिए अतिरिक्त तारों का उपयोग किया जाता है। इनसे उत्पन्न मूल आवृत्ति और अधिस्वरकों का मिश्रण वाद्ययंत्र की विशिष्ट ध्वनि-गुणता प्रदान करता है।
ध्वनि की आवृत्ति का प्रयोगात्मक अध्ययन
ध्वनि की आवृत्ति का अध्ययन करने के लिए मोबाइल में उपलब्ध ऑडियो स्पेक्ट्रम जैसे उपकरणों का उपयोग किया जा सकता है। ऐसे उपकरण ध्वनि में उपस्थित विभिन्न आवृत्तियों को पहचानकर उन्हें ग्राफ या Hz के रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं।
इस प्रकार अलग-अलग वाद्ययंत्रों, मानव आवाज और विभिन्न स्वरों की आवृत्तियों की तुलना की जा सकती है।
ध्वनि की विशेषताओं का आपसी संबंध
किसी ध्वनि की पहचान केवल एक ही भौतिक राशि से नहीं होती। आवृत्ति, आयाम और ध्वनि में उपस्थित विभिन्न आवृत्तियों के मिश्रण से ध्वनि का अनुभव निर्धारित होता है।
- आवृत्ति ध्वनि के तारत्व से संबंधित है।
- आयाम ध्वनि की प्रबलता से संबंधित है।
- मूल आवृत्ति और अधिस्वरकों का मिश्रण ध्वनि-गुणता को प्रभावित करता है।
- इसी कारण अलग-अलग स्रोतों से उत्पन्न ध्वनियाँ एक-दूसरे से अलग पहचानी जा सकती हैं।
Concept Builder
आवृत्ति → तारत्व
आयाम → प्रबलता
मूल आवृत्ति + अधिस्वरक → ध्वनि-गुणता
मूल आवृत्ति का 2 गुना → एक अष्टक ऊपर
यही चार संबंध ध्वनि के मानवीय अनुभव को समझने की सबसे आसान कुंजी हैं।
Exam Booster
- स्वर क्या है? — लगभग एकल आवृत्ति वाली ध्वनि को स्वर कहते हैं।
- मूल आवृत्ति क्या है? — संगीत स्वर में उपस्थित सबसे कम आवृत्ति को मूल आवृत्ति कहते हैं।
- अधिस्वरक क्या हैं? — मूल आवृत्ति के अतिरिक्त उपस्थित उच्चतर आवृत्तियाँ अधिस्वरक कहलाती हैं।
- ध्वनि-गुणता क्या है? — समान स्वर और प्रबलता वाली ध्वनियों को अलग पहचानने में सहायता करने वाला ध्वनि का गुण।
- समान स्वर वाले दो वाद्ययंत्र अलग क्यों सुनाई देते हैं? — उनके अधिस्वरकों के मिश्रण और ध्वनि-गुणता में अंतर के कारण।
- अष्टक क्या है? — ऐसी दो समान स्वर वाली ध्वनियों के बीच का अंतराल जिनकी मूल आवृत्तियों का अनुपात 2 : 1 हो।
- 200 Hz और 400 Hz की ध्वनियों में क्या संबंध है? — 400 Hz की ध्वनि 200 Hz की ध्वनि से एक अष्टक ऊपर है।
- सितार और बाँसुरी की ध्वनि अलग क्यों होती है? — दोनों में कंपन करने वाले भाग और उत्पन्न अधिस्वरकों का मिश्रण अलग होता है।
- तबले की स्याही क्या है? — तबले के ढोल-शीर्ष पटल के मध्य भाग में लगाया गया काला पदार्थ, जो पटल के कंपन और ध्वनि को प्रभावित करता है।
- ध्वनि की आवृत्ति किसमें मापी जाती है? — हर्ट्ज (Hz) में।
- तारत्व किससे संबंधित है? — आवृत्ति से।
- प्रबलता किससे संबंधित है? — आयाम से।
- ध्वनि-गुणता किससे प्रभावित होती है? — मूल आवृत्ति तथा अधिस्वरकों के मिश्रण से।
इस पाठ के अन्य दुसरे विषय भी देखे :
1. Chapter Review and Key Points
6. ध्वनि तरंगों के प्रमुख अभिलक्षण
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