Chapter-जनन: जीवन की निरंतरता Science Exploration class 9 in hindi Medium CBSE Notes
CBSE Class 9 Science Exploration Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.
जनन: जीवन की निरंतरता
पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन
अध्याय 11. जनन — जीवन की निरंतरता
पौधों में लैंगिक जनन मुख्यतः पुष्पों में होता है। पुष्प के नर और मादा जनन अंग युग्मकों के निर्माण, परागण और निषेचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। निषेचन के बाद बीज और फल का निर्माण होता है।
पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन
परिभाषा: पौधों में नर और मादा युग्मकों के संलयन द्वारा नई संतति उत्पन्न होने की प्रक्रिया को लैंगिक जनन कहते हैं।
पुष्प पौधे का प्रमुख जनन अंग है। एक पूर्ण पुष्प के चार प्रमुख भाग होते हैं— बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर। इनमें पुंकेसर नर जनन भाग तथा स्त्रीकेसर मादा जनन भाग है।
पुष्प के जनन अंग
पुंकेसर (Stamen)
परिभाषा: पुष्प के नर जनन अंग को पुंकेसर कहते हैं।
पुंकेसर में तंतु और परागकोश होते हैं। परागकोश में परागकण बनते हैं और इन्हीं में नर युग्मक पाए जाते हैं।
स्त्रीकेसर (Pistil)
परिभाषा: पुष्प के मादा जनन अंग को स्त्रीकेसर कहते हैं।
स्त्रीकेसर के तीन प्रमुख भाग होते हैं— वर्तिकाग्र, वर्तिका और अंडाशय। अंडाशय में बीजांड होते हैं और प्रत्येक बीजांड में एक अंड कोशिका अर्थात मादा युग्मक होता है।
| जनन अंग | मुख्य भाग | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| पुंकेसर | तंतु, परागकोश | परागकण और नर युग्मक से संबंधित |
| स्त्रीकेसर | वर्तिकाग्र, वर्तिका, अंडाशय | मादा युग्मक और बीजांड से संबंधित |
परागण (Pollination)
परिभाषा: परागकोश से पुष्प के वर्तिकाग्र तक परागकणों के स्थानांतरण को परागण कहते हैं।
परागण पौधों में फल और बीज के निर्माण के लिए आवश्यक प्रक्रिया है। परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँचने के बाद आगे की जनन प्रक्रिया शुरू होती है।
परागण के प्रकार
स्व-परागण (Self-pollination)
परिभाषा: जब परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र या उसी पौधे के किसी दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, तो इसे स्व-परागण कहते हैं।
पर-परागण (Cross-pollination)
परिभाषा: जब एक पौधे के पुष्प के परागकोश से परागकण उसी प्रकार के दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, तो इसे पर-परागण कहते हैं।
| स्व-परागण | पर-परागण |
|---|---|
| उसी पुष्प या उसी पौधे के पुष्प में परागण | एक पौधे से दूसरे पौधे के पुष्प तक परागण |
| परागकणों का स्रोत और प्राप्तकर्ता निकट होते हैं | परागकणों को दूसरे पौधे तक पहुँचना पड़ता है |
परागण के माध्यम
परागकणों को एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक पहुँचाने के लिए विभिन्न बाहरी माध्यम सहायता करते हैं। इन्हें परागणकारी कहा जाता है। प्रमुख परागणकारी हैं— वायु, जल, कीट और पक्षी।
- वायु: गेहूँ, मक्का और चावल जैसे पौधों में वायु द्वारा परागण होता है। इनके परागकण सामान्यतः हल्के और बड़ी संख्या में बनते हैं।
- जल: वैलिसनेरिया और हाइड्रिला जैसे जलीय पौधों में जल परागकणों को एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक पहुँचा सकता है।
- कीट: मधुमक्खियाँ और तितलियाँ अनेक पौधों में परागण में सहायता करती हैं। इनके पुष्प प्रायः रंगीन, सुगंधित और मकरंद वाले होते हैं।
- पक्षी: कुछ पुष्पों में पक्षी परागणकारी का कार्य करते हैं।
परागण और जननीय सफलता
पौधों ने परागण की सफलता बढ़ाने के लिए विभिन्न अनुकूलन विकसित किए हैं। कीट-परागित पौधों में रंग, सुगंध और मकरंद परागणकारियों को आकर्षित करते हैं। इनके परागकण चिपचिपे या काँटेदार हो सकते हैं, जिससे वे कीटों के शरीर से चिपक जाते हैं।
वायु-परागित पौधे बहुत बड़ी संख्या में हल्के परागकण बनाते हैं, जिससे उनमें से कुछ परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँच सकें।
पराग नलिका का निर्माण
परिभाषा: वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद परागकण द्वारा बनाई गई नली को पराग नलिका कहते हैं।
परागकण के वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद उससे पराग नलिका निकलती है। यह वर्तिका से होकर नीचे अंडाशय की ओर बढ़ती है और नर युग्मक को बीजांड तक पहुँचाने में सहायता करती है।
निषेचन (Fertilisation)
परिभाषा: नर और मादा युग्मकों के संलयन को निषेचन कहते हैं।
पराग नलिका के माध्यम से नर युग्मक बीजांड तक पहुँचता है। वहाँ नर युग्मक और अंड कोशिका का संलयन होता है। इससे निषेचित अंडाणु अर्थात युग्मनज बनता है।
परागकण → पराग नलिका → नर युग्मक → अंड कोशिका → निषेचन → युग्मनज
बीज और फल का निर्माण
निषेचन के बाद युग्मनज आगे चलकर भ्रूण में विकसित होता है। अंडाशय बढ़कर फल में विकसित होता है, जबकि अंडाशय के भीतर स्थित बीजांड बीज में विकसित होते हैं।
- निषेचित अंडाणु → युग्मनज → भ्रूण
- बीजांड → बीज
- अंडाशय → फल
बीज का अंकुरण
परिभाषा: अनुकूल परिस्थितियों में बीज से नए पौधे का विकसित होना बीज का अंकुरण कहलाता है।
जब जल, वायु और तापमान जैसी परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तो बीज अंकुरित होकर नए पौधे में विकसित हो जाता है।
पौधों में लैंगिक जनन का महत्त्व
लैंगिक जनन केवल नए पौधों का निर्माण ही नहीं करता, बल्कि संततियों में आनुवंशिक विभिन्नताएँ भी उत्पन्न करता है। ये विभिन्नताएँ बदलते परिवेश में पौधों के अनुकूलन और उत्तरजीविता में सहायता कर सकती हैं।
Concept Builder
पुंकेसर → परागकण → नर युग्मक
स्त्रीकेसर → अंडाशय → बीजांड → अंड कोशिका
परागकोश → वर्तिकाग्र = परागण
वर्तिकाग्र → वर्तिका → अंडाशय/बीजांड = पराग नलिका का मार्ग
नर युग्मक + अंड कोशिका → निषेचन → युग्मनज
बीजांड → बीज
अंडाशय → फल
बीज → अनुकूल परिस्थितियाँ → अंकुरण → नया पौधा
Exam Booster
- पुष्प का नर जनन अंग कौन-सा है? — पुंकेसर।
- पुष्प का मादा जनन अंग कौन-सा है? — स्त्रीकेसर।
- पुंकेसर के दो मुख्य भाग कौन-से हैं? — तंतु और परागकोश।
- स्त्रीकेसर के तीन भाग कौन-से हैं? — वर्तिकाग्र, वर्तिका और अंडाशय।
- परागण क्या है? — परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों का स्थानांतरण।
- स्व-परागण क्या है? — उसी पुष्प या उसी पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र तक परागकणों का पहुँचना।
- पर-परागण क्या है? — एक पौधे के पुष्प से उसी प्रकार के दूसरे पौधे के पुष्प तक परागकणों का स्थानांतरण।
- परागण के प्रमुख माध्यम कौन-से हैं? — वायु, जल, कीट और पक्षी।
- पराग नलिका का क्या कार्य है? — नर युग्मक को बीजांड तक पहुँचाने में सहायता करना।
- निषेचन के बाद क्या बनता है? — युग्मनज।
- बीजांड किसमें विकसित होता है? — बीज में।
- अंडाशय किसमें विकसित होता है? — फल में।
- बीज अंकुरण के लिए किन परिस्थितियों की आवश्यकता होती है? — अनुकूल जल, वायु और तापमान।
- पौधों में लैंगिक जनन का एक महत्त्व क्या है? — यह आनुवंशिक विभिन्नता उत्पन्न करता है, जो बदलते परिवेश में अनुकूलन और उत्तरजीविता में सहायक हो सकती है।
इस पाठ के अन्य दुसरे विषय भी देखे :
1. Chapter Review and Key Points
8. पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन
9. पादप प्रजनन में लैंगिक जनन का महत्त्व
10. जन्तुओं में निषेचन की विधियाँ
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