Chapter-जनन: जीवन की निरंतरता Science Exploration class 9 in hindi Medium CBSE Notes
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जनन: जीवन की निरंतरता
Chapter Review and Key Points
Chapter 11. जनन — जीवन की निरंतरता
जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं। यह प्रक्रिया पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनाए रखने के साथ-साथ जीवों में आनुवंशिक समानता और विविधता उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस अध्याय में अलैंगिक एवं लैंगिक जनन, पौधों और जंतुओं में जनन, मानव जनन तथा जनन से संबंधित विभिन्न प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया है।
Chapter Review
- जनन का अर्थ – जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं।
- जीवन की निरंतरता – जनन के कारण एक जीव के समाप्त हो जाने के बाद भी उसकी संतति के माध्यम से जीवन की निरंतरता बनी रहती है।
- जनन के प्रमुख प्रकार – सजीव मुख्यतः अलैंगिक जनन और लैंगिक जनन द्वारा प्रजनन करते हैं।
- अलैंगिक जनन – इसमें सामान्यतः केवल एक जनक भाग लेता है और उत्पन्न संतति आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती है।
- अलैंगिक जनन के उदाहरण – अमीबा, यीस्ट, हाइड्रा तथा अनेक पौधों में अलैंगिक जनन पाया जाता है।
- कायिक प्रवर्धन – पौधे के कायिक भागों जैसे तने, जड़ या पत्ती से नया पौधा बनने की प्रक्रिया कायिक प्रवर्धन कहलाती है।
- कायिक प्रवर्धन के उदाहरण – आलू, अदरक, मनीप्लांट, गन्ना और ब्रायोफिलम इसके उदाहरण हैं।
- कायिक प्रवर्धन की कृषि में उपयोगिता – इससे वांछित गुणों वाले पौधों को कम समय में बड़ी संख्या में तैयार किया जा सकता है।
- कायिक प्रवर्धन की विधियाँ – कटिंग, कलम बाँधना, परतन और ऊतक संवर्धन इसके प्रमुख तरीके हैं।
- कटिंग – पौधे के तने या शाखा के एक भाग को मिट्टी में लगाकर नया पौधा विकसित किया जाता है।
- कलम बाँधना – एक पौधे की स्वस्थ जड़युक्त शाखा या तने पर दूसरे वांछित पौधे की कलम स्थापित करके नया पौधा तैयार किया जाता है।
- परतन – पौधे की एक शाखा को जनक पौधे से जुड़े रहते हुए मिट्टी में दबाया जाता है; जड़ें बनने के बाद उसे अलग करके नया पौधा बनाया जाता है।
- ऊतक संवर्धन – पौधे के ऊतक या विशेष वृद्धि-भागों से प्रयोगशाला में बड़ी संख्या में स्वस्थ पौधे तैयार किए जा सकते हैं।
- यीस्ट में मुकुलन – यीस्ट की जनक कोशिका पर छोटा उभार या मुकुल बनता है, जो विकसित होकर नया जीव बन जाता है।
- हाइड्रा में मुकुलन – हाइड्रा के शरीर पर कोशिका विभाजन से मुकुल बनता है, जो विकसित होकर जनक से अलग स्वतंत्र जीव बन जाता है।
- बीजाणु निर्माण – कवक जैसे जीवों में बड़ी संख्या में बीजाणु बनते हैं, जो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर नए जीव उत्पन्न करते हैं।
- बीजाणुओं की विशेषता – बीजाणु छोटे, हल्के और सामान्यतः एककोशिकीय होते हैं तथा वायु द्वारा आसानी से फैल सकते हैं।
- समसूत्री विभाजन – अलैंगिक जनन में कोशिका विभाजन से सामान्यतः दो संतति कोशिकाएँ बनती हैं जिनमें जनक कोशिका के समान गुणसूत्र संख्या होती है।
- क्लोन – अलैंगिक जनन से उत्पन्न आनुवंशिक रूप से समान संततियों को क्लोन कहा जाता है।
- लैंगिक जनन – इसमें दो जनकों का आनुवंशिक योगदान होता है और संतति में दोनों जनकों के गुणों का संयोजन होता है।
- लैंगिक जनन में विविधता – दो जनकों के आनुवंशिक पदार्थ के मिश्रण के कारण संतति में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।
- विविधता का महत्त्व – विभिन्नताएँ जीवों को बदलते पर्यावरण के प्रति अनुकूलन में सहायता कर सकती हैं और दीर्घकाल में विकास में योगदान देती हैं।
- अर्धसूत्री विभाजन – यह विशेष प्रकार का कोशिका विभाजन है जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी होकर अगुणित युग्मक बनते हैं।
- युग्मक – लैंगिक जनन में भाग लेने वाली अगुणित जनन कोशिकाओं को युग्मक कहते हैं; जंतुओं में नर युग्मक शुक्राणु और मादा युग्मक अंडाणु होते हैं।
- मानव में गुणसूत्र – मनुष्य की कोशिकाओं में 23 जोड़े अर्थात कुल 46 गुणसूत्र होते हैं।
- पुष्पीय पौधों में लैंगिक जनन – पुष्पीय पौधों में फूल जनन अंग के रूप में कार्य करता है और लैंगिक जनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- पुष्प के चार प्रमुख भाग – बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर फूल के प्रमुख भाग हैं।
- पुंकेसर – यह फूल का नर जनन भाग है और इसमें तंतु तथा परागकोश होते हैं; परागकोश में परागकण बनते हैं।
- स्त्रीकेसर – यह फूल का मादा जनन भाग है और इसके मुख्य भाग वर्तिकाग्र, वर्तिका तथा अंडाशय हैं।
- अंडाशय – अंडाशय के भीतर बीजांड पाए जाते हैं और प्रत्येक बीजांड में मादा युग्मक पाया जाता है।
- परागण – परागकणों का परागकोश से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है।
- परागण के माध्यम – वायु, जल, कीट तथा पक्षी जैसे विभिन्न माध्यम परागण में सहायता कर सकते हैं।
- स्व-परागण – जब परागकण उसी फूल या उसी पौधे के उपयुक्त वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं तो इसे स्व-परागण कहते हैं।
- पर-परागण – जब परागकण एक पौधे से उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं तो इसे पर-परागण कहते हैं।
- परागण की युक्तियाँ – फूलों का रंग, गंध, आकार और अन्य विशेषताएँ परागणकारियों को आकर्षित करने में सहायता कर सकती हैं।
- निषेचन – नर और मादा युग्मकों के संलयन को निषेचन कहते हैं। इससे युग्मनज का निर्माण होता है।
- युग्मनज – निषेचन के बाद बनने वाली कोशिका युग्मनज कहलाती है, जो आगे भ्रूण में विकसित होती है।
- फल और बीज का निर्माण – पुष्पीय पौधों में निषेचन के बाद अंडाशय फल में और बीजांड बीज में विकसित होते हैं।
- जंतुओं में जनन – जंतुओं में अलैंगिक तथा लैंगिक दोनों प्रकार के जनन पाए जा सकते हैं।
- बाह्य निषेचन – जब नर और मादा युग्मकों का संलयन शरीर के बाहर होता है, तो इसे बाह्य निषेचन कहते हैं।
- आंतरिक निषेचन – जब नर और मादा युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के भीतर होता है, तो इसे आंतरिक निषेचन कहते हैं।
- आंतरिक निषेचन का लाभ – इसमें युग्मकों और प्रारंभिक भ्रूण के सुरक्षित रहने की संभावना अधिक होती है।
- जनन परिपक्वता – किशोरावस्था के दौरान शरीर में ऐसे शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन होते हैं जिनसे जनन अंग परिपक्व होते हैं और युग्मक बनने लगते हैं।
- मानव नर जनन तंत्र – इसमें वृषण, शुक्रवाहिनी, मूत्रमार्ग, प्रोस्टेट ग्रंथि, शुक्राशय और शिश्न आदि प्रमुख भाग शामिल हैं।
- वृषण का कार्य – वृषण नर जनन कोशिकाओं अर्थात शुक्राणुओं का निर्माण करते हैं तथा जनन से संबंधित हार्मोन स्रावित करते हैं।
- मानव मादा जनन तंत्र – इसमें अंडाशय, अंडवाहिनी, गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा और योनि प्रमुख भाग हैं।
- अंडाशय का कार्य – अंडाशय अंडाणु उत्पन्न करते हैं और जनन से संबंधित हार्मोन भी स्रावित करते हैं।
- गर्भाशय – निषेचन के बाद विकसित होने वाला भ्रूण गर्भाशय में आगे विकसित होता है।
- युग्मकजनन – युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मकजनन कहते हैं।
- अंडोत्सर्ग – अंडाशय से परिपक्व अंडाणु के निकलने की प्रक्रिया अंडोत्सर्ग कहलाती है।
- रजोधर्म या माहवारी – यदि निषेचन नहीं होता है तो गर्भाशय की आंतरिक परत रक्त के साथ शरीर से बाहर निकलती है; इसे रजोधर्म या माहवारी कहते हैं।
- मासिक चक्र – अंडोत्सर्ग, गर्भाशय की तैयारी और माहवारी से संबंधित घटनाएँ सामान्यतः 21–35 दिनों के चक्र में दोहराती हैं।
- निषेचन और गर्भावस्था – शुक्राणु और अंडाणु के संलयन से युग्मनज बनता है, जो आगे भ्रूण में विकसित होता है और गर्भावस्था आरंभ होती है।
- गर्भावस्था – भ्रूण का गर्भाशय में विकास गर्भावस्था कहलाता है और इसकी सामान्य अवधि लगभग नौ माह होती है।
- गर्भावस्था के दौरान देखभाल – उचित पोषण, नियमित चिकित्सा जाँच, पर्याप्त विश्राम तथा हानिकारक पदार्थों से बचाव माँ और भ्रूण दोनों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
- जन्म नियंत्रण – अनचाहे गर्भधारण को रोकने के लिए विभिन्न जन्म नियंत्रण विधियों का उपयोग किया जा सकता है।
- जन्म नियंत्रण की विधियाँ – कंडोम, गोलियाँ और अंतर्गर्भाशयी युक्ति जैसे कॉपर-T अध्याय में दिए गए प्रमुख उदाहरण हैं।
- आई.वी.एफ. (IVF) – निषेचन की ऐसी तकनीक जिसमें अंडाणु और शुक्राणु का संलयन शरीर के बाहर नियंत्रित परिस्थितियों में कराया जाता है; अध्याय में इसके वैज्ञानिक एवं सामाजिक संदर्भ पर भी चर्चा की गई है।
- जनन और कृषि – अलैंगिक जनन से समान गुणों वाले पौधों का तेजी से प्रवर्धन किया जा सकता है, जबकि लैंगिक जनन आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करने में उपयोगी है।
- जनन और जीवन की निरंतरता – जनन केवल नए जीवों के निर्माण की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आनुवंशिक जानकारी के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरण तथा जीवों की निरंतरता का आधार है।
Chapter in One View
जनन → अलैंगिक जनन → कायिक प्रवर्धन → मुकुलन → बीजाणु निर्माण → लैंगिक जनन → अर्धसूत्री विभाजन → युग्मक → पुष्पीय पौधों में परागण → निषेचन → युग्मनज → बीज एवं फल → जंतुओं में जनन → मानव जनन → युग्मकजनन → अंडोत्सर्ग → निषेचन → गर्भावस्था → जन्म नियंत्रण
Exam Focus
- अलैंगिक और लैंगिक जनन में अंतर।
- कायिक प्रवर्धन की विधियाँ और कृषि में उपयोगिता।
- मुकुलन और बीजाणु निर्माण।
- समसूत्री और अर्धसूत्री विभाजन की भूमिका।
- लैंगिक जनन में आनुवंशिक विविधता का महत्त्व।
- पुष्प के भाग और उनके कार्य।
- स्व-परागण और पर-परागण।
- परागण और निषेचन में अंतर।
- निषेचन के बाद फल और बीज का निर्माण।
- बाह्य और आंतरिक निषेचन।
- मानव नर एवं मादा जनन तंत्र के प्रमुख अंग।
- युग्मकजनन, अंडोत्सर्ग और रजोधर्म।
- निषेचन से भ्रूण और गर्भावस्था तक की प्रक्रिया।
- जन्म नियंत्रण की प्रमुख विधियाँ।
- गर्भावस्था के दौरान उचित पोषण, चिकित्सा जाँच और स्वास्थ्य देखभाल।
इस पाठ के अन्य दुसरे विषय भी देखे :
1. Chapter Review and Key Points
8. पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन
9. पादप प्रजनन में लैंगिक जनन का महत्त्व
10. जन्तुओं में निषेचन की विधियाँ
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