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Chapter-जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण Science Exploration class 9 in hindi Medium CBSE Notes


Last Updated : August 16, 2026

CBSE Class 9 Science Exploration Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.

Chapter-जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण Science Exploration class 9 in hindi Medium CBSE Notes
Updated on: 16 August 2026

जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण

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जगत प्लांटी

अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

पादप जगत में मुख्यतः बहुकोशिकीय, स्वपोषी और यूकैरियोटिक जीव शामिल होते हैं। पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं और पृथ्वी के अधिकांश आहार जालों का आधार तैयार करते हैं। पादप जगत को थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म पाँच प्रमुख वर्गों में बाँटा गया है।

जगत प्लांटी (Plantae)

परिभाषा: मुख्यतः बहुकोशिकीय, स्वपोषी और यूकैरियोटिक जीवों के समूह को प्लांटी या पादप जगत कहते हैं।

  • पादप बहुकोशिकीय होते हैं।
  • इनकी कोशिकाएँ यूकैरियोटिक होती हैं।
  • इनकी कोशिका भित्ति मुख्यतः सेलुलोज की बनी होती है।
  • ये सामान्यतः प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
  • पादप अधिकांश आहार श्रृंखलाओं का आधार होते हैं।
  • ये प्रकाश संश्लेषण के दौरान ऑक्सीजन छोड़ते हैं।

पादप जगत के पाँच वर्ग

प्लांटी → थैलोफाइटा → ब्रायोफाइटा → टेरिडोफाइटा → जिम्नोस्पर्म → एंजियोस्पर्म

थैलोफाइटा (Thallophyta) — आद्य पौधे

परिभाषा: सरल शरीर-संरचना वाले आद्य पादप, जिनका शरीर स्पष्ट जड़, तना और पत्तियों में विभेदित नहीं होता, थैलोफाइटा कहलाते हैं।

थैलोफाइट को सामान्यतः शैवाल के रूप में जाना जाता है। ये अधिकतर जल या नम वातावरण में पाए जाते हैं। इनके शरीर को थैलस कहा जाता है। थैलस एक सरल संरचना है, जिसके माध्यम से जल, पोषक तत्वों और गैसों का आदान-प्रदान होता है।

उदाहरण: स्पाइरोगाइरा।

  • शरीर सरल और थैलस जैसा होता है।
  • स्पष्ट जड़, तना और पत्तियाँ नहीं होतीं।
  • अधिकांश जल या नम स्थानों में पाए जाते हैं।
  • जल इनके जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • सरल शरीर-संरचना इन्हें जलीय पर्यावरण में रहने में सहायता करती है।

लाइकेन

लाइकेन दो जीवों के बीच सहजीवी संबंध का उदाहरण है। इसमें एक भागीदार स्वपोषी शैवाल और दूसरा विषमपोषी कवक होता है। शैवाल प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन प्रदान करता है, जबकि कवक सुरक्षा प्रदान करता है।

लाइकेन का उपयोग वायु की गुणवत्ता के प्राकृतिक जैव संकेतक के रूप में भी किया जा सकता है क्योंकि कुछ लाइकेन वायु प्रदूषकों के अनुसार अपना रंग बदलते हैं। कुछ लाइकेन मसाले, औषधि और रंग बनाने में भी उपयोग किए जाते हैं। 

ब्रायोफाइटा (Bryophyta) — पादप जगत के उभयचर

परिभाषा: ऐसे सरल स्थलीय पादप जो भूमि पर रहते हैं लेकिन जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं, ब्रायोफाइटा कहलाते हैं।

ब्रायोफाइट जल से स्थल पर पादपों के संक्रमण को दर्शाते हैं। इनमें थैलोफाइटा की तुलना में शरीर अधिक विभेदित होता है। इनमें जड़ों जैसी संरचनाएँ मूलाभास (Rhizoids) कहलाती हैं। कुछ में तने और पत्तियों जैसी सरल संरचनाएँ भी पाई जाती हैं।

उदाहरण: मॉस और मार्केंशिया।

  • नम और छायादार स्थानों में पाए जाते हैं।
  • इनका शरीर थैलोफाइटा की तुलना में अधिक विभेदित होता है।
  • वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ स्पष्ट रूप से विकसित नहीं होतीं।
  • मूलाभास जैसी संरचनाएँ पाई जाती हैं।
  • इनमें जल और भोजन के परिवहन के लिए विकसित संवहनी ऊतक नहीं होते।
  • जनन के लिए जल आवश्यक होता है।

उभयचर क्यों कहलाते हैं? ब्रायोफाइट भूमि पर रहते हैं, लेकिन जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं। इसलिए इन्हें पादप जगत का उभयचर कहा जाता है। 

टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) — संवहनी ऊतक वाले पौधे

परिभाषा: ऐसे पादप जिनमें वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ तथा जल और भोजन के परिवहन के लिए संवहनी ऊतक पाए जाते हैं, टेरिडोफाइटा कहलाते हैं।

फर्न टेरिडोफाइट का सामान्य उदाहरण है। इन पौधों में शरीर का संगठन ब्रायोफाइटा की तुलना में अधिक विकसित होता है। इनमें जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक पाए जाते हैं।

  • वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं।
  • जाइलम और फ्लोएम उपस्थित होते हैं।
  • जाइलम जल का परिवहन करता है।
  • फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।
  • ये स्थल पर रहते हैं।
  • जनन के लिए अभी भी जल की आवश्यकता होती है।
  • ये बीज उत्पन्न नहीं करते।

उदाहरण: फर्न। 

जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms) — अनावृत बीजी पौधे

परिभाषा: ऐसे बीजधारी पादप जिनके बीज फल के अंदर बंद नहीं होते बल्कि सामान्यतः शंकुओं पर खुले रूप में पाए जाते हैं, जिम्नोस्पर्म कहलाते हैं।

जिम्नोस्पर्म ठंडे और शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुकूलित होते हैं। इनकी सुई या शल्क जैसी पत्तियाँ जल की हानि को कम करती हैं। इनके बीज विकसित होते हुए भ्रूण की रक्षा करते हैं और उनमें भोजन संचित रहता है।

उदाहरण: चीड़ (Pine) और साइकैड।

  • स्थलीय पादप होते हैं।
  • इनकी पत्तियाँ प्रायः सुई जैसी होती हैं।
  • पत्तियाँ जल की हानि को कम करने में सहायता करती हैं।
  • बीज बनाते हैं।
  • बीज फल के अंदर बंद नहीं होते।
  • बीज सामान्यतः शंकुओं पर अनावृत रहते हैं।
  • निषेचन के लिए जल की आवश्यकता नहीं होती।
  • शुष्क परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन पाया जाता है।

मुख्य विकासात्मक महत्त्व: जिम्नोस्पर्म में जनन के लिए जल पर निर्भरता कम हो गई और बीजों ने विकसित होते भ्रूण की सुरक्षा तथा भोजन के भंडारण में सहायता की। 

एंजियोस्पर्म (Angiosperms) — आवृतबीजी एवं पुष्पीय पौधे

परिभाषा: ऐसे पादप जो पुष्प और फल बनाते हैं तथा जिनके बीज फल के अंदर आवरित रहते हैं, एंजियोस्पर्म कहलाते हैं।

एंजियोस्पर्म सबसे अधिक विविधता वाला पादप समूह है। इनमें जड़, तना और पत्तियाँ सुविकसित होती हैं। ये पुष्पों के माध्यम से लैंगिक जनन करते हैं। इनके फल बीजों को सुरक्षा प्रदान करते हैं और बीजों को नए स्थानों तक फैलाने में सहायता करते हैं।

  • जड़, तना और पत्तियाँ सुविकसित होती हैं।
  • पुष्प बनाते हैं।
  • पुष्पों के माध्यम से लैंगिक जनन करते हैं।
  • फल और बीज उत्पन्न करते हैं।
  • बीज फल के अंदर आवरित रहते हैं।
  • बीजों का प्रकीर्णन कीटों, पक्षियों, जन्तुओं, वायु या जल द्वारा हो सकता है।
  • इनमें पादप शरीर और जनन तंत्र अधिक विकसित होता है।
  • ये विभिन्न प्रकार के पर्यावरणों में सफलतापूर्वक रह सकते हैं।

उदाहरण: गुलमोहर और अन्य पुष्पीय पौधे। 

पादप वर्गों में क्रमिक विकास

थैलोफाइटा से एंजियोस्पर्म तक पादपों की संरचना और जनन में क्रमिक परिवर्तन दिखाई देते हैं। प्रारंभिक पादप जल पर अधिक निर्भर थे। बाद के पादपों में संवहनी ऊतक, बीज और पुष्प जैसे अनुकूलन विकसित हुए, जिससे वे विभिन्न स्थलीय परिस्थितियों में अधिक सफलतापूर्वक रह सके। 

वर्ग मुख्य विशेषता जल पर निर्भरता बीज
थैलोफाइटा सरल थैलस शरीर अधिक नहीं
ब्रायोफाइटा मूलाभास; सरल शरीर जनन के लिए आवश्यक नहीं
टेरिडोफाइटा जड़, तना, पत्ती और संवहनी ऊतक जनन के लिए आवश्यक नहीं
जिम्नोस्पर्म अनावृत बीज निषेचन के लिए आवश्यक नहीं हाँ
एंजियोस्पर्म पुष्प, फल और आवृत बीज निषेचन के लिए आवश्यक नहीं हाँ

Concept Builder

थैलोफाइटा → सरल थैलस शरीर → मुख्यतः जल/नम वातावरण

ब्रायोफाइटा → भूमि पर जीवन + जनन के लिए जल → पादप जगत के उभयचर

टेरिडोफाइटा → वास्तविक जड़, तना, पत्ती + जाइलम/फ्लोएम → बीज नहीं

जिम्नोस्पर्म → बीज + बीज अनावृत + निषेचन के लिए जल आवश्यक नहीं

एंजियोस्पर्म → पुष्प + फल + आवृत बीज → सबसे अधिक विविध पादप समूह

Exam Booster

  • प्लांटी की मुख्य विशेषता क्या है? — बहुकोशिकीय, स्वपोषी, यूकैरियोटिक जीव तथा मुख्यतः सेलुलोज की कोशिका भित्ति।
  • पादप जगत के पाँच वर्ग कौन-से हैं? — थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म।
  • थैलोफाइटा का शरीर क्या कहलाता है? — थैलस।
  • ब्रायोफाइटा को पादप जगत का उभयचर क्यों कहते हैं? — क्योंकि वे भूमि पर रहते हैं लेकिन जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं।
  • टेरिडोफाइटा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता क्या है? — इनमें वास्तविक जड़, तना, पत्तियाँ तथा जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक होते हैं।
  • टेरिडोफाइटा बीज क्यों नहीं बनाते? — इस वर्ग में बीज निर्माण नहीं होता; ये जनन के लिए जल पर निर्भर रहते हैं।
  • जिम्नोस्पर्म को अनावृत बीजी क्यों कहते हैं? — क्योंकि इनके बीज फल के अंदर बंद नहीं होते और सामान्यतः शंकुओं पर खुले रहते हैं।
  • जिम्नोस्पर्म की पत्तियाँ कैसी होती हैं? — प्रायः सुई या शल्क जैसी, जो जल की हानि कम करने में सहायता करती हैं।
  • एंजियोस्पर्म को आवृतबीजी क्यों कहते हैं? — क्योंकि इनके बीज फल के अंदर आवरित रहते हैं।
  • एंजियोस्पर्म की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखिए। — पुष्प और फल का निर्माण तथा फल के अंदर आवरित बीज।
  • पादपों के विकास में सबसे बड़ा परिवर्तन क्या दिखाई देता है? — जल पर निर्भरता में कमी, संवहनी ऊतकों का विकास, बीज का विकास और अंततः पुष्प तथा फल का विकास।
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