Chapter-जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण Science Exploration class 9 in hindi Medium CBSE Notes
CBSE Class 9 Science Exploration Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.
जीवजगत का स्वरूप: विविधता एवं वर्गीकरण
प्रोटोकॉर्डेटा
अध्याय 12. जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण
जीवों का वर्गीकरण लगातार विकसित होने वाली वैज्ञानिक प्रक्रिया है। नई खोजों और जीवों की संरचना, कोशिकीय संगठन तथा आनुवंशिक विशेषताओं की बेहतर समझ के साथ वर्गीकरण प्रणालियों में भी परिवर्तन हो सकता है।
प्रोटोकॉर्डेटा (Protochordata)
परिभाषा: ऐसे कॉर्डेट जीव जिनमें जीवन की कम-से-कम किसी एक अवस्था में पृष्ठरज्जु पाई जाती है, लेकिन वे पूर्ण विकसित कशेरुकियों की तुलना में सरल संगठन प्रदर्शित करते हैं, प्रोटोकॉर्डेटा कहलाते हैं।
प्रोटोकॉर्डेटा अकशेरुकी जीवों से कशेरुकी जीवों की ओर होने वाले संक्रमण को समझने में महत्वपूर्ण हैं। इनके जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु की उपस्थिति कॉर्डेटा से इनके संबंध को दर्शाती है।
इस प्रकार प्रोटोकॉर्डेटा में ऐसी विशेषताएँ दिखाई देती हैं जो सरल कॉर्डेट संगठन और अधिक विकसित कशेरुकी संगठन के बीच संबंध को समझने में सहायता करती हैं।
कशेरुकी वर्गों का पुनरावलोकन
कशेरुकी जन्तुओं को पाँच प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है—
- मत्स्य: मुख्यतः जलीय जीवन के लिए अनुकूलित।
- उभयचर: जल और स्थल दोनों वातावरणों से संबंधित।
- सरीसृप: मुख्यतः स्थलीय जीवन के लिए अनुकूलित।
- पक्षी: उड़ान के लिए विशेष रूप से अनुकूलित।
- स्तनधारी: मादा में स्तन ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, जो शिशुओं के पोषण में सहायता करती हैं।
वर्गीकरण केवल नामकरण नहीं है
परिभाषा: जीवों को नाम देने के साथ-साथ उनके बीच के संबंध, पृथ्वी पर जीवन के इतिहास और जैव विविधता के संरक्षण को समझने में सहायता करने वाली वैज्ञानिक व्यवस्था को वर्गीकरण कहा जाता है।
वर्गीकरण का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि कोई जीव किस नाम से जाना जाता है। इसके माध्यम से वैज्ञानिक जीवों के बीच समानताओं और भिन्नताओं को समझते हैं तथा उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करते हैं।
- जीवों के बीच संबंधों को समझने में सहायता करता है।
- पृथ्वी पर जीवन के इतिहास को समझने में सहायता करता है।
- जैव विविधता को व्यवस्थित रूप से समझने में सहायता करता है।
- जैव विविधता के संरक्षण की योजना बनाने में उपयोगी है।
- नए जीवों की पहचान और वर्गीकरण को व्यवस्थित करता है।
विषाणु (Viruses)
परिभाषा: विषाणु अकोशिकीय संरचनाएँ हैं जिनमें आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है, लेकिन उनमें स्वतंत्र कोशिकीय संगठन नहीं होता।
विषाणुओं में जीवों की तरह आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है, लेकिन उनमें कोशिकीय संरचना नहीं होती। वे परपोषी कोशिका के बाहर निष्क्रिय रह सकते हैं और जीवित कोशिका के अंदर ही अपनी प्रतिकृति बनाने में सक्षम होते हैं।
विषाणु पाँच-जगत में क्यों नहीं रखे जाते?
- उनमें स्वतंत्र कोशिकीय संगठन नहीं होता।
- वे स्वतंत्र रूप से जीवन की सभी आवश्यक प्रक्रियाएँ नहीं कर सकते।
- परपोषी कोशिका के बाहर वे निष्क्रिय रह सकते हैं।
- उनकी प्रतिकृति के लिए जीवित कोशिका आवश्यक होती है।
इसी कारण विषाणुओं को पाँच-जगत वर्गीकरण के किसी भी जगत में रखना उचित नहीं माना जाता।
वर्गीकरण प्रणालियों की सीमाएँ
परिभाषा: जब किसी वर्गीकरण प्रणाली की निर्धारित विशेषताएँ सभी जीवों की विविधता को पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पातीं, तो यह उस प्रणाली की सीमा को दर्शाता है।
जीवों की वास्तविक विविधता बहुत अधिक जटिल है। इसलिए कोई भी वर्गीकरण प्रणाली सभी जीवों को हर परिस्थिति में पूरी तरह स्पष्ट रूप से वर्गीकृत नहीं कर सकती। नई वैज्ञानिक जानकारी मिलने पर पुराने वर्गीकरण में संशोधन की आवश्यकता हो सकती है।
एककोशिकीय जीवों की समस्या
सभी एककोशिकीय जीवों को केवल एक ही समूह में रखना उचित नहीं है, क्योंकि उनकी कोशिका संरचना, पोषण और अन्य विशेषताओं में महत्वपूर्ण अंतर हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, मोनेरा के जीव प्रोकैरियोटिक होते हैं, जबकि प्रोटिस्टा के जीव मुख्यतः यूकैरियोटिक होते हैं। इसलिए केवल “एककोशिकीय” होना वर्गीकरण का पर्याप्त आधार नहीं है।
केवल पोषण के आधार की सीमा
दो जीवों में पोषण की समान विधि हो सकती है, लेकिन उनकी कोशिका संरचना और अन्य विशेषताएँ अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी जीव का वर्गीकरण केवल उसके पोषण की विधि के आधार पर नहीं किया जा सकता।
केवल आवास के आधार की सीमा
यदि वर्गीकरण केवल आवास के आधार पर किया जाए, तो अलग-अलग विकासात्मक और संरचनात्मक विशेषताओं वाले जीव एक ही समूह में आ सकते हैं। इसलिए वैज्ञानिक वर्गीकरण में अनेक विशेषताओं को एक साथ ध्यान में रखना आवश्यक है।
टेरिडोफाइटा और ब्रायोफाइटा में अंतर
दोनों समूहों में पुष्प और बीज नहीं होते, फिर भी उन्हें अलग-अलग वर्गों में रखा जाता है क्योंकि उनकी संरचना और संवहनी तंत्र में महत्वपूर्ण अंतर है।
| आधार | ब्रायोफाइटा | टेरिडोफाइटा |
|---|---|---|
| शरीर संगठन | सरल | अधिक विकसित |
| वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ | स्पष्ट रूप से विकसित नहीं | उपस्थित |
| संवहनी ऊतक | अनुपस्थित | जाइलम और फ्लोएम उपस्थित |
| बीज | नहीं | नहीं |
| जनन में जल | आवश्यक | आवश्यक |
इससे स्पष्ट होता है कि केवल एक विशेषता के आधार पर वर्गीकरण नहीं किया जाता। कई संरचनात्मक और कार्यात्मक विशेषताओं को एक साथ ध्यान में रखा जाता है।
वर्गीकरण की विकासशील प्रकृति
वर्गीकरण प्रणालियाँ स्थिर नहीं हैं। जैसे-जैसे वैज्ञानिकों को कोशिकीय संरचना, आनुवंशिक विशेषताओं और जीवों के विकासात्मक संबंधों के बारे में नई जानकारी प्राप्त होती है, वर्गीकरण की प्रणालियों में भी सुधार किया जा सकता है।
इसलिए वैज्ञानिक वर्गीकरण को एक विकासशील वैज्ञानिक व्यवस्था के रूप में समझना चाहिए।
फुमडिस और संगाई हिरण
फुमडिस: मणिपुर की लोकटक झील में पाए जाने वाले तैरते हुए घास के मैदानों को स्थानीय भाषा में फुमडिस कहा जाता है। ये मिट्टी की तैरती हुई परतें होती हैं जिन पर मूलबद्ध वनस्पतियाँ उगती हैं।
फुमडिस एक विशिष्ट पर्यावास का निर्माण करते हैं और अनेक विशेष वनस्पतियों तथा जीवों को आश्रय देते हैं। इनका संरक्षण स्थानीय जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है।
संगाई हिरण
परिभाषा: संगाई हिरण मणिपुर में पाए जाने वाली एक स्थानिक हिरण जाति है, जो मुख्यतः फुमडिस पर अपना जीवन व्यतीत करती है।
संगाई हिरण को उसके विशेष खुरों और लंबे पैरों की बनावट के आधार पर पहचाना जा सकता है। इसका विशेष पर्यावास इसे फुमडिस से अत्यधिक जुड़ा हुआ बनाता है।
वर्ष 1951 में संगाई हिरण को विलुप्त घोषित कर दिया गया था, लेकिन वर्ष 1953 में इसे पुनः खोजा गया। वर्तमान में इसका संरक्षण किया जा रहा है और इसे IUCN की रेड डेटा सूची में शामिल किया गया है।
पर्यावास और जैव विविधता संरक्षण
किसी जीव का संरक्षण केवल उस जीव की रक्षा करने से पूरा नहीं होता। उसके प्राकृतिक पर्यावास की रक्षा करना भी आवश्यक है। यदि किसी जीव का विशिष्ट पर्यावास नष्ट होता है, तो उस पर निर्भर जीवों की संख्या और पारिस्थितिक संतुलन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
संगाई हिरण का उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि किसी स्थानिक जीव के संरक्षण के लिए उसके विशिष्ट पर्यावास का संरक्षण भी आवश्यक है।
Concept Builder
प्रोटोकॉर्डेटा → जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु → कॉर्डेटा से संबंध
विषाणु → अकोशिकीय + आनुवंशिक पदार्थ + परपोषी कोशिका पर निर्भर
वर्गीकरण की सीमा → जीवों की अत्यधिक विविधता → एक ही आधार पर्याप्त नहीं
सही वर्गीकरण → कोशिका संरचना + संगठन + पोषण + संरचना + अन्य विशेषताएँ
फुमडिस → लोकटक झील → मणिपुर → विशिष्ट पर्यावास → संगाई हिरण
पर्यावास का विनाश → जैव विविधता में कमी → जीवों की उत्तरजीविता पर खतरा
Exam Booster
- प्रोटोकॉर्डेटा क्या है? — ऐसे कॉर्डेट जीव जिनमें जीवन की कम-से-कम किसी एक अवस्था में पृष्ठरज्जु पाई जाती है।
- विषाणु पाँच-जगत में क्यों नहीं रखे जाते? — क्योंकि उनमें स्वतंत्र कोशिकीय संगठन नहीं होता और वे परपोषी कोशिका पर निर्भर रहते हैं।
- क्या सभी एककोशिकीय जीवों को एक ही जगत में रखा जा सकता है? — नहीं, क्योंकि उनकी कोशिका संरचना और अन्य विशेषताएँ अलग हो सकती हैं।
- वर्गीकरण केवल पोषण के आधार पर क्यों नहीं किया जा सकता? — क्योंकि अलग-अलग जीवों की पोषण विधि समान हो सकती है, जबकि उनकी कोशिकीय और संरचनात्मक विशेषताएँ अलग होती हैं।
- वर्गीकरण केवल आवास के आधार पर क्यों नहीं करना चाहिए? — इससे अलग-अलग विकासात्मक और संरचनात्मक विशेषताओं वाले जीव एक ही समूह में आ सकते हैं।
- ब्रायोफाइटा और टेरिडोफाइटा में मुख्य अंतर क्या है? — टेरिडोफाइटा में जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक तथा वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं, जबकि ब्रायोफाइटा में ये विकसित नहीं होते।
- वर्गीकरण को विकासशील वैज्ञानिक व्यवस्था क्यों कहते हैं? — क्योंकि नई वैज्ञानिक जानकारी मिलने पर वर्गीकरण प्रणालियों में संशोधन किया जा सकता है।
- फुमडिस कहाँ पाए जाते हैं? — मणिपुर की लोकटक झील में।
- संगाई हिरण की विशेषता क्या है? — यह मणिपुर में पाया जाने वाला स्थानिक हिरण है और फुमडिस से संबंधित विशिष्ट पर्यावास में रहता है।
- संगाई हिरण के संरक्षण के लिए उसके पर्यावास की रक्षा क्यों आवश्यक है? — क्योंकि उसका जीवन विशिष्ट फुमडिस पर्यावास से जुड़ा हुआ है और पर्यावास के नष्ट होने से उसकी संख्या प्रभावित हो सकती है।
इस पाठ के अन्य दुसरे विषय भी देखे :
1. Chapter Review and Key Points
3. जैव विविधता का विकास और जीवों का वर्गीकरण
4. जैविक वर्गीकरण प्रणालियों का विकास
9. वर्गीकरण की पदानुक्रमिक प्रकृति
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