1000 ईस्वी तक राज्य और समाज Social Science class 9 in Hindi Medium ncert book solutions Additional Questions with Answers
1000 ईस्वी तक राज्य और समाज Additional Questions with Answers – Complete NCERT Book Solutions for Class 9 Social Science (Hindi Medium). Get all chapter explanations, extra questions, solved examples and additional practice questions for 1000 ईस्वी तक राज्य और समाज Additional Questions with Answers to help you master concepts and score higher.
1000 ईस्वी तक राज्य और समाज Social Science class 9 in Hindi Medium ncert book solutions Additional Questions with Answers
NCERT Solutions for Class 9 Social Science play an important role in helping students understand the concepts of the chapter 1000 ईस्वी तक राज्य और समाज clearly. This chapter includes the topic Additional Questions with Answers, which is essential from both academic and examination point of view. The solutions provided here are prepared strictly according to the latest NCERT syllabus and follow the guidelines of CBSE to ensure accuracy and relevance. Each question is explained in a simple and student-friendly manner so that learners can grasp the concepts without confusion. These NCERT Solutions are useful for regular study, homework help, and exam preparation. All textbook questions are solved step by step to improve problem-solving skills and conceptual clarity. Students of Class 9 studying Social Science can use these solutions to revise important topics, understand difficult questions, and practise effectively before examinations. The chapter 1000 ईस्वी तक राज्य और समाज is explained in a structured way, making it easier for students to connect the theory with the topic Additional Questions with Answers. By studying these updated NCERT Solutions for Class 9 Social Science, students can build a strong foundation, boost their confidence, and score better marks in school and board exams.
1000 ईस्वी तक राज्य और समाज
Additional Questions with Answers
अध्याय 5. 1000 ईस्वी तक राज्य और समाज
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर (Additional Extra Questions with Answers)
प्रश्न 1. प्रारम्भिक भारतीय इतिहास को समझने के लिए साहित्यिक स्रोत क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर: साहित्यिक स्रोत प्रारम्भिक भारतीय समाज, राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। ऋग्वेद, अन्य वेद, उपनिषद, महाभारत, अर्थशास्त्र, संगम साहित्य तथा विभिन्न अभिलेखों से उस समय की सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं के बारे में जानकारी मिलती है।
प्रश्न 2. ऋग्वेद प्रारम्भिक वैदिक समाज के अध्ययन में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर: ऋग्वेद से प्रारम्भिक वैदिक लोगों के राजनीतिक संगठन, सामाजिक जीवन, धार्मिक विश्वास, आर्थिक गतिविधियों और विभिन्न जनों के बारे में जानकारी मिलती है। इसमें सभा, समिति, विदथ, राजा और विभिन्न सामाजिक समूहों का उल्लेख भी मिलता है।
प्रश्न 3. प्रारम्भिक वैदिक काल में राजा की मुख्य भूमिका क्या थी?
उत्तर: प्रारम्भिक वैदिक काल में राजा जन या लोगों का प्रमुख था। उसका प्रमुख दायित्व अपने लोगों की रक्षा करना, युद्ध में नेतृत्व करना और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में भूमिका निभाना था। उसकी शक्ति विभिन्न सभाओं और सामुदायिक संस्थाओं से भी जुड़ी हुई थी।
प्रश्न 4. सभा और समिति में क्या अंतर था?
उत्तर: सभा अपेक्षाकृत छोटी संस्था थी, जिसमें चुनिंदा लोगों की भागीदारी होती थी और इसका संबंध न्यायिक तथा महत्वपूर्ण सामाजिक मामलों से था। समिति अपेक्षाकृत बड़ी सभा थी, जो नीतिगत और राजनीतिक मामलों पर विचार करती थी तथा व्यापक जनसमुदाय का प्रतिनिधित्व करती थी।
प्रश्न 5. विदथ क्या था?
उत्तर: विदथ प्रारम्भिक वैदिक काल की एक सामुदायिक सभा थी। इसमें युद्ध, राजनीतिक तथा अन्य सामुदायिक विषयों पर विचार किया जाता था। इसे प्रारम्भिक वैदिक राजनीतिक-सामाजिक संगठन की महत्वपूर्ण संस्था माना जाता है।
प्रश्न 6. जन से जनपद बनने की प्रक्रिया में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर: प्रारम्भिक अवस्था में लोगों की पहचान मुख्यतः रिश्तेदारी और जन से जुड़ी थी। धीरे-धीरे जब लोग किसी निश्चित भू-भाग में स्थायी रूप से बसने लगे, तो भूमि और क्षेत्रीय पहचान का महत्व बढ़ा। इस प्रकार जन-आधारित राजनीतिक संगठन धीरे-धीरे जनपदों में विकसित हुए।
प्रश्न 7. महाजनपद क्या थे?
उत्तर: बड़े और अधिक संगठित राजनीतिक राज्यों को महाजनपद कहा गया। लगभग 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक अनेक बड़े राजनीतिक संगठन विकसित हो चुके थे। परंपरागत रूप से 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें मगध आगे चलकर एक शक्तिशाली राज्य बना।
प्रश्न 8. मगध के शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरने में किन कारकों ने सहायता की?
उत्तर: मगध की उपजाऊ भूमि, कृषि उत्पादन, संसाधनों की उपलब्धता, रणनीतिक भौगोलिक स्थिति और शक्तिशाली शासकों ने उसके विस्तार में सहायता की। इन परिस्थितियों ने मगध को एक बड़े राजनीतिक शक्ति-केंद्र के रूप में विकसित होने में मदद की।
प्रश्न 9. गण या संघ किस प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था को दर्शाते हैं?
उत्तर: गण या संघ ऐसी राजनीतिक व्यवस्थाएँ थीं जिनमें सत्ता केवल एक राजा के हाथ में केंद्रित नहीं थी। सामूहिक निर्णय लेने वाली संस्थाओं या समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इस प्रकार प्रारम्भिक भारत में राजतंत्र के साथ राजनीतिक संगठन के अन्य रूप भी मौजूद थे।
प्रश्न 10. सप्तांग सिद्धांत क्या है?
उत्तर: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के सात प्रमुख अंगों की अवधारणा मिलती है। ये हैं—स्वामी या राजा, अमात्य या मंत्री, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड या सैन्य शक्ति तथा मित्र। राज्य के प्रभावी संचालन के लिए इन सभी अंगों का महत्व माना गया।
प्रश्न 11. अमात्यों और मंत्रियों की भूमिका क्या थी?
उत्तर: अमात्य और मंत्री राजा को शासन संबंधी कार्यों में सहायता करते थे। वे प्रशासन, राजस्व, न्याय, सेना तथा अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जिम्मेदारियाँ निभाते थे। अनुभवी अधिकारियों की सहायता से राजा बड़े राज्य का प्रशासन संचालित करता था।
प्रश्न 12. चक्रवर्ती की अवधारणा से क्या समझा जाता है?
उत्तर: चक्रवर्ती की अवधारणा व्यापक राजनीतिक प्रभुत्व और बड़े भू-भाग पर अधिकार से संबंधित थी। प्रारम्भिक भारतीय राजनीतिक विचार में पूरे व्यापक क्षेत्र को एक राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत लाने की कल्पना विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में दिखाई देती है।
प्रश्न 13. धर्म का अर्थ केवल धर्म या Religion क्यों नहीं माना जाना चाहिए?
उत्तर: अध्याय में धर्म को कर्तव्य, उत्तरदायित्व, नैतिकता, उचित आचरण और सामाजिक दायित्वों के व्यापक अर्थ में समझाया गया है। धर्म व्यक्ति को उसके जीवन और सामाजिक भूमिका के अनुसार उचित आचरण करने की दिशा देता है।
प्रश्न 14. ऋत (Ṛita) की अवधारणा क्या थी?
उत्तर: ऋत को प्रकृति और समाज में व्यवस्था, संतुलन तथा सामंजस्य बनाए रखने वाले व्यापक सिद्धांत के रूप में समझाया गया है। यह प्राकृतिक शक्तियों, नैतिक मूल्यों और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के बीच संतुलन से संबंधित था।
प्रश्न 15. अशोक के धम्म की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: अशोक के धम्म में नैतिक आचरण, परिवार के सदस्यों के प्रति सम्मान, करुणा, अहिंसा और दैनिक जीवन में उचित व्यवहार पर जोर दिया गया। उसके अभिलेखों से शासन और नैतिक मूल्यों के बीच संबंध का पता चलता है।
प्रश्न 16. वर्ण व्यवस्था की चार प्रमुख श्रेणियाँ कौन-सी थीं?
उत्तर: चार प्रमुख वर्ण थे—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इनके साथ क्रमशः ज्ञान एवं धार्मिक कार्य, शासन एवं सुरक्षा, कृषि-पशुपालन-व्यापार तथा विभिन्न प्रकार के सहायक और आर्थिक कार्य जोड़े गए थे।
प्रश्न 17. क्या प्रारम्भिक वैदिक समाज में व्यवसाय पूरी तरह जन्म से निर्धारित थे?
उत्तर: अध्याय के अनुसार प्रारम्भिक वैदिक स्रोतों से ऐसा नहीं लगता कि सामाजिक स्थिति और व्यवसाय पूरी तरह जन्म के आधार पर निश्चित थे। ऋग्वेद में एक ही परिवार में अलग-अलग व्यवसायों का उल्लेख मिलता है—पिता चिकित्सक, माता अनाज पीसने वाली और स्वयं व्यक्ति कवि था। इससे व्यवसाय में लचीलेपन का संकेत मिलता है।
प्रश्न 18. जाति और वर्ण में क्या अंतर था?
उत्तर: वर्ण चार व्यापक सामाजिक श्रेणियों से संबंधित था, जबकि जातियाँ अनेक स्थानीय और व्यावसायिक सामाजिक समूहों के रूप में विकसित हुईं। वर्णों की संख्या चार मानी गई, लेकिन जातियों की संख्या निश्चित नहीं थी। नए सामाजिक समूहों और व्यवसायों के विकास के साथ जातियों की संख्या बढ़ती गई।
प्रश्न 19. सामाजिक गतिशीलता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: सामाजिक गतिशीलता का अर्थ सामाजिक समूहों या व्यवसायों के बीच परिवर्तन और आगे बढ़ने की संभावना से है। अध्याय में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से शासकों के उभरने तथा लोगों द्वारा व्यवसाय बदलने के उदाहरण दिए गए हैं। इससे पता चलता है कि सामाजिक संरचना हमेशा पूरी तरह स्थिर नहीं थी।
प्रश्न 20. कुल, ग्राम, विश और जन के बीच क्या संबंध था?
उत्तर: कुल परिवार की मूल इकाई था। कई परिवार मिलकर ग्राम बनाते थे। कई ग्राम मिलकर विश बनाते थे और विश से ऊपर जन की व्यापक राजनीतिक-सामाजिक इकाई थी। इस प्रकार परिवार से लेकर बड़े जनसमूह तक एक क्रमिक संगठन दिखाई देता है।
प्रश्न 21. चार आश्रम कौन-कौन से थे?
उत्तर: चार आश्रम थे—ब्रह्मचर्य अर्थात विद्यार्थी जीवन, गृहस्थ अर्थात पारिवारिक जीवन, वानप्रस्थ अर्थात धीरे-धीरे सांसारिक जीवन से दूरी का चरण और संन्यास अर्थात त्याग एवं सांसारिक बंधनों से मुक्ति की ओर बढ़ने का चरण।
प्रश्न 22. चार पुरुषार्थ क्या थे?
उत्तर: चार पुरुषार्थ थे—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म उचित आचरण और कर्तव्य से, अर्थ भौतिक समृद्धि से, काम इच्छाओं की पूर्ति से और मोक्ष सांसारिक बंधनों से मुक्ति से संबंधित था।
प्रश्न 23. प्रारम्भिक भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका के बारे में क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर: स्रोतों से महिलाओं की शिक्षा, धार्मिक गतिविधियों और सामाजिक जीवन में भागीदारी के प्रमाण मिलते हैं। ऋग्वेद से अपाला, विश्ववारा, घोषा और लोपामुद्रा जैसी महिला ऋषियों का उल्लेख मिलता है। बाद के काल में भी महिलाओं ने कृषि, शिल्प, घरेलू कार्य, धार्मिक गतिविधियों और कुछ क्षेत्रों में शासन में योगदान दिया।
प्रश्न 24. प्रभावती गुप्ता का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
उत्तर: प्रभावती गुप्ता गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री थीं। उन्होंने वाकाटक राज्य में संरक्षिका के रूप में शासन किया और अपने नाम से भूमि अनुदान जारी किए। उनका उदाहरण प्रारम्भिक भारतीय इतिहास में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका को समझने में महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 25. भक्ति परंपरा के विकास में आलवारों और नयनमारों की क्या भूमिका थी?
उत्तर: 6वीं शताब्दी के तमिल क्षेत्र में आलवारों और नयनमारों ने भक्ति को व्यापक devotional परंपरा के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आलवार विष्णु की भक्ति में गीत रचने वाले संत-कवि थे, जबकि नयनमार शिव की भक्ति से जुड़े संत-कवि थे। उन्होंने तमिल भक्ति साहित्य की समृद्ध परंपरा विकसित की।
प्रश्न 26. गुरुकुल शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर: गुरुकुल में विद्यार्थी गुरु के साथ रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। शिक्षा में वेदों के साथ व्याकरण, तर्क, दर्शन, गणित, विज्ञान, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, कला, संगीत, शारीरिक शिक्षा, योग और ध्यान जैसे विषय शामिल थे। अनुशासन, आत्म-संयम, सेवा और नैतिक चरित्र पर भी जोर दिया जाता था।
प्रश्न 27. प्रारम्भिक भारत के प्रमुख शिक्षा केन्द्रों के नाम लिखिए।
उत्तर: तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी, विक्रमशिला, वाराणसी, कांचीपुरम, मिथिला, ओदंतपुरी, पुष्पगिरि और अन्य केन्द्र प्रारम्भिक भारत में शिक्षा और ज्ञान के महत्वपूर्ण केन्द्र रहे।
प्रश्न 28. कृषि प्रारम्भिक भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार क्यों थी?
उत्तर: कृषि ग्रामीण जीवन और राज्य की आय दोनों के लिए महत्वपूर्ण थी। कृषि से लोगों की खाद्य आवश्यकताएँ पूरी होती थीं और भूमि से प्राप्त राजस्व राज्य की आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार था। इसलिए सिंचाई, भूमि प्रबंधन और कृषि विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया।
प्रश्न 29. सिंचाई के विकास में राज्य की क्या भूमिका थी?
उत्तर: राज्य बाँधों, जलाशयों, नहरों और अन्य सिंचाई संरचनाओं के निर्माण तथा रखरखाव में भूमिका निभाता था। सुदर्शन झील के पास बाँध और चोलों की सिंचाई व्यवस्था इसके उदाहरण हैं। सिंचाई से कृषि उत्पादन और राज्य के राजस्व दोनों को सहायता मिलती थी।
प्रश्न 30. उत्तरापथ और दक्षिणापथ क्या थे?
उत्तर: उत्तरापथ और दक्षिणापथ प्रारम्भिक ऐतिहासिक भारत के प्रमुख स्थल व्यापार मार्ग थे। इन मार्गों ने उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों को जोड़ा और वस्तुओं, लोगों तथा विचारों के आवागमन में सहायता की।
प्रश्न 31. श्रेणियाँ (Guilds) क्या थीं?
उत्तर: समान व्यवसाय, शिल्प या पेशे से जुड़े व्यापारियों और कारीगरों के संगठित समूहों को श्रेणियाँ कहा जाता था। वे वस्तुओं की गुणवत्ता, कीमत और पेशेवर नियमों को नियंत्रित करती थीं। कुछ श्रेणियाँ बैंकिंग और वित्तीय गतिविधियों में भी भाग लेती थीं।
प्रश्न 32. श्रेणियों की आर्थिक भूमिका केवल व्यापार तक सीमित क्यों नहीं थी?
उत्तर: श्रेणियाँ वस्तुओं की गुणवत्ता और कीमत नियंत्रित करने के साथ-साथ अपने सदस्यों के आचरण की निगरानी करती थीं। कुछ श्रेणियाँ धन जमा स्वीकार करती थीं, उस पर ब्याज देती थीं और धार्मिक संस्थाओं के रखरखाव में आर्थिक सहायता करती थीं। इसलिए वे आर्थिक और वित्तीय संस्थाओं के रूप में भी कार्य करती थीं।
प्रश्न 33. नाशिक अभिलेख से श्रेणियों के बारे में क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर: नाशिक गुफा अभिलेख से पता चलता है कि धन पेशेवर श्रेणियों में जमा किया जाता था। श्रेणियाँ उस धन पर निश्चित ब्याज देती थीं और उससे प्राप्त आय का उपयोग बौद्ध मठों और गुफाओं के रखरखाव के लिए किया जाता था।
प्रश्न 34. चोल प्रशासन की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: चोल प्रशासन में एक ओर साम्राज्य को मंडलम्, वलनाडु, नाडु और गाँवों जैसी प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा गया था, दूसरी ओर ग्राम सभाओं को स्थानीय प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका प्राप्त थी। वे भूमि, सिंचाई, राजस्व, सड़क और स्थानीय विवादों जैसे कार्य संभालती थीं।
प्रश्न 35. उत्तरमेरूर अभिलेख इतिहासकारों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: उत्तरमेरूर अभिलेख चोल कालीन ग्राम प्रशासन की विस्तृत जानकारी देता है। इसमें ग्राम सभाओं, समितियों और कुडवोलै प्रणाली के बारे में जानकारी मिलती है। इससे स्थानीय प्रशासन और प्रतिनिधियों के चयन की तत्कालीन व्यवस्था को समझने में सहायता मिलती है।
प्रश्न 36. प्रारम्भिक भारतीय समाज में गाँव का क्या महत्व था?
उत्तर: गाँव प्रशासन की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण इकाई था। गाँव कृषि उत्पादन का केन्द्र था और स्थानीय स्तर पर सिंचाई, भूमि प्रबंधन, सड़क, सामाजिक कल्याण तथा अन्य व्यावहारिक कार्यों का संचालन भी किया जाता था। कई क्षेत्रों में गाँव पर्याप्त रूप से स्वावलंबी और स्थानीय मामलों में स्वायत्त थे।
प्रश्न 37. प्रारम्भिक भारतीय राज्य और समाज में कृषि, व्यापार और शिल्प किस प्रकार जुड़े हुए थे?
उत्तर: कृषि ने भोजन और राजस्व का आधार प्रदान किया। व्यापार मार्गों ने कृषि उत्पादों और शिल्प वस्तुओं को विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचाया। कारीगर और व्यापारी श्रेणियों के माध्यम से संगठित हुए। इस प्रकार कृषि, शिल्प और व्यापार एक-दूसरे से जुड़े हुए आर्थिक तंत्र का हिस्सा थे।
प्रश्न 38. प्रारम्भिक भारत में राजनीतिक परिवर्तन के बावजूद कौन-सी परंपराएँ जारी रहीं?
उत्तर: राजनीतिक सत्ता और राजवंशों में परिवर्तन के बावजूद कृषि, व्यापारिक नेटवर्क, ज्ञान परंपराएँ, धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाएँ तथा स्थानीय संस्थाएँ विभिन्न रूपों में जारी रहीं। भक्ति, शिक्षा, साहित्य और शिल्प जैसी परंपराएँ भी विकसित होती रहीं।
प्रश्न 39. प्रारम्भिक भारतीय राज्य व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर: इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं—राजा और मंत्रियों की भूमिका, प्रशासनिक इकाइयों का विकास, सेना और कोष का महत्व, कर व्यवस्था, ग्राम प्रशासन, सिंचाई का विकास, व्यापार मार्गों की सुरक्षा तथा स्थानीय संस्थाओं की भागीदारी। बड़े राज्यों में प्रशासन को विभिन्न प्रांतों और जिलों में बाँटकर संचालित किया जाता था।
प्रश्न 40. “प्रारम्भिक भारत का राज्य और समाज परिवर्तन तथा निरंतरता दोनों का उदाहरण है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: प्रारम्भिक भारत में जन-आधारित राजनीतिक संगठन धीरे-धीरे जनपदों, महाजनपदों और बड़े साम्राज्यों में विकसित हुए। प्रशासन, कृषि, व्यापार और शिल्प में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इसके साथ ही परिवार, ग्राम, ज्ञान परंपरा, धार्मिक विचार, सांस्कृतिक प्रथाएँ और व्यापारिक नेटवर्क विभिन्न रूपों में जारी रहे। इसलिए इस काल को केवल परिवर्तन या केवल निरंतरता के आधार पर नहीं, बल्कि दोनों के साथ-साथ विकास के रूप में समझना चाहिए।
Welcome to ATP Education
ATP Education