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Chapter 5. विधायिका राजनितिक विज्ञान-I class 11 in Hindi Medium ncert book solutions अभ्यास-प्रश्नावली

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Chapter 5. विधायिका

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अभ्यास-प्रश्नावली

Last Update On: 06 March 2026

 

अभ्यास प्रश्नावली :- 


Q1. आलोक मानता है कि किसी देश को कारगर सरकार की ज़रूत होती है जो जनता की भलाई करे। अतः यदि हम सीधे-सीधे अपना प्रधानमन्त्री और मंत्रिगण चुन लें और शासन का काम उन पर छोड़ दें, तो हमें विधायिका की ज़रूत नहीं पड़ेगी। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।

उत्तर :

वर्तमान समय में आधुनिक व कल्याणकारी राज्यों में विधानपालिका के गठन के बिना सीधे जनता के द्वारा प्रधानमंत्री व मंत्रिमडल का चुनाव असम्भव है | अध्यक्षात्मक कार्यपालिका में भी राज्यों के आकर बड़े होने के कारण यह संभव नहीं  हो है कि राष्ट्रपति व मत्रियों का चुनाव सीधे जनता के द्वारा किया जाये | प्राचीन कल में राजतन्त्र में भी रजा को विभिन्न विषयों पर परामर्श करने के लिए एक सभा अथवा समिति हुआ करती थी | अत : यह अत्यंत आवश्यक है कि पहले एक सभा का गठन किया जाये जिस पर विभिन्न विषयों पर चर्चा हो, बहस हो व मतदान हो तथा निर्णय लिए जा सकें | 

     प्रजातंत्रीय सरकार एक ऐसी सरकार है जिसमे चर्चा , वाद विवाद, विचार - विमर्श अति आवश्यक है जो केवल संसद में ही संभव है | संसद में ही कानून बनने के लिए चर्चा होती  है उसके सभी पक्षों का अध्ययन होता है बजट पास किया जाता है , मंत्रियों व सरकार के सदस्यों से प्रश्न पूछे जाते है व आलोचना की जाती है संविधान में संशोधन किये जाते हैं | अत : यह कहा जा सकता है कि सरकार के तीनों अंगो का अपना अपना महत्व है व संसद के बिना सरकार का कार्य नमुमकिन है | 

Q 2. किसी कक्षा में द्वि -सदनीय प्रणाली के गुणों पर बहस चल रही थी। चर्चा में निम्नलिखित बातें उभरकर सामने आयीं। इन तर्कों को पढि़ए और इनसे अपनी सहमति-असहमति के कारण बताइए।

(क) नेहा ने कहा कि द्वि-सदनीय प्रणाली से कोई उद्देश्य नहीं सधता।

उत्तर :

नेहा के बातों से सहमत नही हुआ जा सकता है क्योकि  दुसरे सदन से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता | कोई भी दूसरा सदन कमजोर सदन हो सकता है,किसी क्षेत्र में उसकी शक्तियां कम हो सकती है परन्तु कोई भी दूसरा सदन निर्थक नही हो सकता | भारत की राज्य सभा कुछ क्षेत्र में विशेष शक्तियाँ रखती है ब्रिटेन की लार्ड सदन गरिमा व परम्परा का प्रतीक है | अमेरिका की सीनेट अनेक क्षेत्रों में निचले सदन अर्थात प्रतिनिधि सदन से भी अधिक शक्तिशाली है सामान्य रूप से ऊपरी सदन के निम्न लाभ है :- 

(i) ऊपरी सदन निचले सदन की मनमानी का नियंत्रित करता है |

(ii) निचले सदन द्वारा पारित बिलों कको दुबारा विचार - विमर्श का अवसर प्रदान करता है |

(iii) जमत निर्माण में सहायक होता है |

(iv) संघीय प्रणाली में दूसरा सदन आवश्यक है | 

(v) विशेष वर्गों का प्रतिनिधत्व करता है | 

(ख) शमा का तर्क था कि राज्य सभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होना चाहिए।

उत्तर :

शमा का कहना सही है कि इस सदन में योग्य व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए व अधिकांश राज्यों में पुरिसदं में योग्य व अनुभवी व्यक्तियों को प्रितिधित्व दिया जाता है | ब्रिटेन की लार्ड सदन में खास वर्ग व पृष्ठभूमि के सदस्यों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है इसे प्रकार से भारत व अमेरिका में भी अनुभवी व योग्य व विशेष योग्यता के सदस्यों को सदनों में प्रितिनिधित्व दिया जाता है | 

(ग) त्रिदेव ने कहा कि यदि कोई देश संघीय नहीं है, तो फिर दूसरे सदन की ज़रूत नहीं रह जाती।

उत्तर :

त्रिदेव का कहना सही है कि जिन राज्यों में संघीय प्रणाली नहीं है वहां द्विसंद्नीय विधानपालिका की आवश्यकता नहीं है परन्तु दूसरा सदन होने से कुछ ना कुछ अवश्य ही उपयोगिता होती है |  

Q3. लोकसभा कार्यपालिका को राज्यसभा की तुलना में क्यों कारगर ढंग से नियंत्रण में रख सकती है?

उत्तर :

लोकसभा व राज्य सभा दोनों संसद के सदन है व सरकार की जिम्मेवारी दोनों सदनों के प्रति है परन्तु लोक सभा के मुकाबले राज्य सभा इस क्षेत्र में कमजोर है निम्न कारणों से लोकसभा का कार्यपालिका पर अधिक प्रभावकारी नियन्त्र होता है :- 

(i) सरकार से विभिन्न तरीके से प्रश्न पूछना, आलोचना करना, काम रोको प्रस्ताव करना व बहिष्कार करना दोनों सदनों का अधिकार है परन्तु सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है | 

(ii) सरकार की स्थिरता उसके लोक सभा में बहुमत पर निर्भर करती है ना कि राज्य सभा में | 

(iii) लोक सभा का चुनाव प्रत्यक्ष तरीके से होता है जबकि राज्य सभा का गठन अप्रत्यक्ष चुनाव से किया जाता है | अत : लोक सभा अधिक लोकप्रिय है | 

(iv) धन बिल पहले केवल लोकसभा में प्रवेश कराया जाता है न कि राज्य सभा में | 

(v) जब मतभेद की परिस्थति में लोकसभा व राज्यसभा का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है तो उसकी अध्यक्षता लोक सभा का अध्यक्ष करता है व लोक सभा का दृष्टिकोण माना जाता है|  
Q4. लोकसभा कार्यपालिका पर कारगर ढंग से नियंत्रण रखने की नहीं बल्कि जन भावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है। क्या आप इससे सहमत हैं कारण बताएँ।

उत्तर :

यह कथन काफी हद तक सही है कि लिक सभा जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है क्योकि लोकसभा 543 चुने हुए प्रतिनिधियों का सदन है जो 11 अरब से अधिक भारतीय जनता के इच्छा, हित , भावनाएं व अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते है परन्तु इस कार्य को करने के लिए लोकसभा के सदस्यों का सरकार पर नियंत्रण करना भी अत्यंत आवश्यक है | सरकार की मनमानी पर नियंत्रण करना , जनता के हितों इच्छाओं व आवश्यकताओं को सरकार तक पहुचना भी जनहित को पूरा करने के लिए आवश्यक है | तथा संसद का कार्य जनता के हितों की रक्षा करना होता है | 

Q5. नीचे संसद को ज्यादा कारगर बनाने के कुछ प्रस्ताव लिखे जा रहे हैं। इनमें से प्रत्येक के  साथ अपनी सहमति या असहमति का उल्लेख करें। यह भी बताएँ कि इन सुझावों को मानने के  क्या प्रभाव होंगे?

(क) संसद को अपेक्षाकृत ज्यादा समय तक काम करना चाहिए।

उत्तर :

 

यह विचार सही है कि वर्तमान में अगर संसद के कार्य करने के समय को देखा जाये तो निश्चित रूप से यह समय आवश्यकता से काम है क्योंकि संसद का काफी समय व्यर्थ के विषयों में नष्ट होता है अत : संसद की प्रभाविकता को बढाने के लिए व अधिक विषयों का उपयोगीपूर्ण तरीके से निपटारा करने के लिए संसद को अपने कार्य करने का वास्तविक समय बढ़ाना चाहिए | यह जनहित में भी व संसद की दक्षता  को बढाने के लिए भी अत्यंत आवश्यक है | 

(ख) संसद के सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।

उत्तर :

यह कथन भी सही है कि संसद के सदस्यों की उपस्थति सदन में आवश्यकता से काफी कम पायी जाती है | अधिकांश सदस्य सदन से अनुपस्थित रहते है जिससे सदन  में बिलिं पर व महत्वपूर्ण विषयों पर उपयोगी व आवश्यक विचार विमर्श व चर्चा नहीं हो पति है अत : यह सुझाव तुरंत प्रभाव से स्वीकार करने योग्य है कि संसद में एक ऐसी आंतरिक व्यवस्था की जानी चाहिए कि संसद के अधिक से अधिक  उपस्थिति को निश्चित किया जाए व बिना किसी ठोस कारण के अनुपस्थिति रहने वाले सदस्य को दण्डित किया जाए | 

(ग) अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा पैदा करने पर सदस्य को दंडित कर सकें ।

उत्तर :

संसदीय प्रणाली की कार्य विधि में संसद के अध्यक्ष का महत्वपूर्ण पद है | अध्यक्ष के पास सदन की कार्यवाही को चलाने के लिए विभिन्न नियम होते है जिनके आधार पर वह विभिन्न विषयों पर निर्णय लेता है | सदन की कार्यवाही में बाधा डालनेवाले सदस्यों को भी वह नियम व परम्परा के आधार पर दंड दे सकता है अध्यक्ष को निश्चित रूप से in कार्य के लिए कुछ विवेकीय अधिकार होने चाहिए | 

Q6. आरिफ यह जानना चाहता था कि अगर मंत्री ही अधिकांश महत्त्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत करते हैं और बहुसंख्यक दल अकसर सरकारी विधेयक को पारित कर देता है, तो फिर  कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की भूमिका क्या है? आप आरिफ को क्या उत्तर देंगे?

उत्तर :

आरिफ का मानना है कि संसदीय प्रणाली में अधिकांश बिल सरकारी बिल होते है जिन्हें मंत्री ही तैयार करते है और मंत्री ही उसको पेश करते है और क्योंकि सदन में सरकार उस दल की होती है जिस दल का सदन में बहुमत होता है | इस स्थिति में व्यावहारिक से यह स्थिति बनती है कि संसद तो केवल उस बिलों र स्टेम्प लगाने वाली संस्था बन गयी है जिन बिलों को मंत्री पेश करती है | परन्तु सरकार बनाने के बाद सदन कार्यपालिका और विधानपालिका में बट जाता है विधानपालिका के सदस्यों का दायित्व यह होता है कि वे सदन में जनहित को ध्यान में रख कर सरकार के निर्णयों का समर्थन करे या विरोध करे भले ही वे किसी भी दल के हो | कार्यपालिका पुरे सदन के प्रति जिम्मेदार होती है सरकारी दल के सदस्य व विरोधी दल के सदस्य सभी विधानपालिका के सदस्य होते है | कार्यपालिका में मंत्री व प्रधानमंत्री शामिल होते हैं |

शासक दल के सदस्य सरकार की हर सही व गलत बात का समर्थन करेगें ऐसा नही है क्योंकि उनकी भी संसद के सदस्यों के रूप में अपनी भूमिका होतीं है | 

Q7. आप निम्नलिखित में से किस कथन से सबसे ज्यादा सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण दें।
(क) सांसद/विधायकों को अपनी पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट होनी चाहिए।
(ख) दलबदल विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसद/विधयकों पर बढ़ा है।
(ग) दलबदल हमेशा स्वार्थ के लिए होता है और इस कारण जो विधायक/सांसद दूसरे दलमें शामिल होना चाहता है उसे आगामी दो वर्षों के लिए मंत्री-पद के अयोग्य करार कर दिया जाना चाहिए।

उत्तर :

हम तीसरे कथन से सबसे अधिक सहमत है कि दल बदल अधिकांशत: सभी राजनितिक दलों में स्वार्थ पर आधारित किया गया कार्य है | ऐसे बहुत कम उदाहरण है जहाँ सिद्धांत के मतभेद के कारण दल बदल हुआ हो | भारत में दल बदल को नियंत्रण करने के लिए की प्रयास किये गए | दूसरा संविधान इस दिशा में एक प्रभावकारी कदम कदम था परन्तु इससे भी दल बदल घटा नहीं बल्कि इससे और अधिक बढ़ा | अत: यह सुझाव सही है कि दल बदल को रोकने के लिए कोई सख्त दंड आवश्यक रूप से निश्चत किया जाना चाहिए जो यह भी हो सकता है कि दल बदल करने वाले सदस्यों को मंत्री व अन्य किसी महत्वपूर्ण लाभ के पद से निश्चित समय के लिए वंचित क्र देना चाहिए ताकि दंड के भय से इस दल बदल की प्रवृति पर नियंत्रण किया जा सके | 

Q8. डॉली और सुधा में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि मौजूदा वक्त में संसद कितनी कारगर और प्रभावकारी है। डॉली का मानना था कि भारतीय संसद के कामकाज में गिरावट आयी है।यह गिरावट एकदम साफ़ दिखती है क्योंकि अब बहस-मुबाहिसे पर समय कम खर्च होता हैऔर सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने अथवा वॉकआउट (बहिर्गमन) करने में ज्यादा | सुधा का तर्क था कि लोकसभा में अलग-अलग सरकारों ने मुँह की खायी है,धाराशायी हुई हैं। आप सुधा या डॉली के तर्क के पक्ष या विपक्ष में और कौन-सा तर्क देंगे?

उत्तर : 

डॉली का कथन सही है कि सदन का बहुमूल्य समय व्यर्थ ही बहस व गतिविधियों में नष्ट हो जाता है तथा उपयोगी कार्य कम हो पाते हैं | संसद के वातावरण व कार्यविधि में गिरावट आयी है जिससे संसद की गरिमा को भी धक्का लगा है | आये दिन संसद में गैर संसदीय भाषा का प्रयोग होता रहता है शोर शराबे में कोई किसी की नहीं सुनता | सदन के अध्यक्ष प्राय असहाय दिखाई देते है | छोटी - छोटी बात में चप्पलें भी चलती है | कई राज्यों में हिंसात्मक घटनाएं भी होती रहती है | इस सब के होते संसद का प्रभाव व गरिमा में गिरावट आयी है जो की एक गम्भीर विषय है | 

सुधा का कथन भी सही है कि बार-बार सरकारें गिरती है अर्थात जिस सरकार की संसद में बहुमत सम्माप्त हो जाती है तो वह सरकार गिर जाती है परन्तु यह भी कोई अच्छा लक्षण नही है | यह भी संसद की गिरती गरिमा व प्रभाविकता का ही परिचायक है |  

Q9. किसी विधेयक को कानून बनने के क्रम में जिन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है उन्हें क्रमवार सजाएँ।
(क) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।
(ख) विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है - बताएँ कि वह अगर इस पर हस्ताक्षर नहीं करता/करती है, तो क्या होता है?
(ग) विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहाँ इसे पारित कर दिया जाता है।
(घ) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में हुआ है उसमें यह विधेयक पारित होता है।
(ड) विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
(च) विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है - समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है।
(छ) संबंद्ध मंत्री विधेयक की ज़रूत के बारे में प्रस्ताव करता है।
(ज) विधि-मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।

उत्तर : 

किसी विधेयक को कानून बनने के क्रम में जिन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है वह निम्न है :- 

(छ) संबंद्ध मंत्री विधेयक की ज़रूत के बारे में प्रस्ताव करता है।

(ज) विधि-मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।

(क) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।

(च) विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है - समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है |

(ड) विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।

(घ) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में हुआ है उसमें यह विधेयक पारित होता है।

(ग) विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहाँ इसे पारित कर दिया जाता है।

(ख) विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है - बताएँ कि वह अगर इस पर हस्ताक्षर नहीं करता/करती है, तो क्या होता है?

 

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

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