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Chapter 3. चुनाव और प्रतिनिधित्व राजनितिक विज्ञान-I class 11 in Hindi Medium ncert book solutions अभ्यास-प्रश्नावली

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Chapter 3. चुनाव और प्रतिनिधित्व

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अभ्यास-प्रश्नावली

Last Update On: 06 March 2026

 

अभ्यास प्रश्नावली :


Q1. निम्नलिखित में कौन प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नजदीक बैठता है?

(क) परिवार की बैठक में होने वाली चर्चा

(ख) कक्षा-संचालक (क्लास-मॉनीटर) का चुनाव

(ग) किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन

(घ) मीडिया द्वारा करवाये गये जनमत-संग्रह

उत्तर :

(घ) मीडिया द्वारा करवाये गये जनमत-संग्रह 

Q2. इनमें कौन-सा कार्य चुनाव आयोग नहीं करता?

(क) मतदाता-सूची तैयार करना

(ख) उम्मीदवारों का नामांकन

(ग) मतदान- केन्द्रों की स्थापना

(घ) आचार-संहिता लागू करना

(ड) पंचायत के चुनावों का पर्यवेक्षण

उत्तर : 

(ख) उम्मीदवारों का नामांकन

Q3. निम्नलिखित में कौन-सी बात राज्य सभा और लोक सभा के सदस्यों के  चुनाव
की प्रणाली में समान है?

(क) 18 वर्ष से ज्यादा की उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य है।

(ख) विभिन्न प्रत्याशियों के बारे में मतदाता अपनी पसंद को वरीयता क्रम में
रख सकता है।

(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है

(घ) विजयी उम्मीदवार को अधिक से अधिक मत प्राप्त होने चाहिए।

उत्तर : 

(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है |

Q4. फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोषित किया जाता है जो -

(क) सर्वाधिक संख्या में मत अर्जित करता है

(ख) देश में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाले दल का सदस्य हो।

(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है।

(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है।

उत्तर : 

(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज्यादा मत हासिल करता है। 

Q5. पृथक निर्वाचन-मंडल और आरक्षित चुनाव-क्षेत्र के बीच क्या अंतर है?संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल को क्यों स्वीकार नहीं किया?

उत्तर : 

पृथक निर्वाचन-मंडल और आरक्षित चुनाव-क्षेत्र के बीच निम्नलिखित अंतर है:- 

स्वतंत्रता के पूर्व भी इस विषय पर बहस हुई थी और ब्रिटिश सरकार ने‘पृथक-निर्वाचन मंडल’ की शुरूआत की थी। इसका अर्थ यह था कि किसी समुदाय के प्रतिनिधि के चुनाव में केवल उसी समुदाय के लोग वोट डाल सकेगें। संविधान सभा के अनेक सदस्यों को इस पर शंका थी। उनका विचार था कि यह व्यवस्था हमारे उद्देश्यों को पूरा नहीं करेगी।

इसलिए, आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था को अपनाया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत, किसी निर्वाचन क्षेत्रा में सभी मतदाता वोट तो डालेंगे लेकिन प्रत्याशी केवल उसी समुदाय या सामाजिक वर्ग का होगा जिसके लिए वह सीट आरक्षित है।

संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल को  इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि :- 

अनेक ऐसे सामाजिक समूह हैं जो पूरे देश में फैले हुए हैं। किसी एक निर्वाचन क्षेत्र में उनकी इतनी संख्या नहीं होती कि वे किसी प्रत्याशी की जीत को प्रभावित करसके। लेकिन पूरे देश पर नजर डालने पर वे अच्छे खासे बड़े समूह के रूप में दिखाई देते हैं। उन्हें समुचित प्रिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था जरूरी हो जातीहै। संविधान अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं में आरक्षण की व्यवस्था करता है। प्रारंभ में यह व्यवस्था 10वर्ष के लिए की गई थी पर अनेक सवैधानिक संशोधनों द्वारा इसे बढ़ा कर 2010 तक कर दिया गया है। आरक्षण की अवधि खत्म होने पर संसद इसे और आगे बढ़ाने का निर्णय ले सकती है। इन दोनों समूहों की आरक्षित सीटों का वही अनुपात है जो भारतकी जनसंख्या में इनका अनुपात है। आज लोकसभा की 543 निर्वाचित सीटों में 79अनुसूचित जाति और 41 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।

Q6. निम्नलिखित में कौन-सा कथन गलत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द अथवा पद को बदलकर, जोड़कर अथवा नये क्रम में सजाकर इसे सही करें।

(क) एक फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली (‘जो सबसे आगे वही जीते प्रणाली’) का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।

उत्तर :

यह कथन गलत है क्योंकि पी.टी.पी.प्रणाली का प्रयोंग हर समय नहीं होता हैं | राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, व राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव एकल  मत प्रणाली के द्वारा होता है | अन्य चुनावों में पी.टी.पी. प्रणाली का पालन होता है |  

(ख) चुनाव आयोग पंचायत और नगरपालिका के चुनावों का पर्यवेक्षण नहीं करता।

उत्तर :

यह कथन सही है | 

(ग) भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता।

उत्तर :

यह कथन गलत है कि भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता। लेकिन राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को हटा सकता जब उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो जाए |

(घ) चुनाव आयोग में एक से ज्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।

उत्तर :

यह कथन सही है | 

Q7. भारत की चुनाव-प्रणाली का लक्ष्य समाज के कमजोर तबके की नुमाइंदगी को
सुनिश्चित करना है। लेकिन अभी तक हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की
संख्या 10 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंचती। इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या
उपाय सुझायेंगे
?

उत्तर : 
Q8. एक नये देश के संविधान के बारे में आयोजित किसी संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्नलिखित आशाएँ जतायीं। प्रत्येक कथन के बारे में बतायें कि उनके लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली) उचित होगी या समानुपातिक प्रतिनिधित्व वाली प्रणाली?

(क) लोगों को इस बात की साफ़ - साफ़ जानकारी होनी चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है ताकि वे उसे निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा सके |

उत्तर :

लोगों की इच्छाओं को अधिक प्रभावी रूप से व्यक्त करने के लिए फ.पा.टी.पो. मत प्रणाली सबसे अधिक उपयुक्त होगी क्योंकि इसमें नागरिकों को प्रतिनिधियों का सीधा संपर्क रहता है | तथा नागरिक अपनी प्रतिनिधि को सीधे रु से जिम्मेवार ठहराकर उन्हें अगले चुनाव में सत्ता से हटा सकते है | प्रथम रूप में इस प्रणाली में नागरिकों को अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनने का मौका मिलता है |  

(ख) हमारे देश में भाषाई रूप से अल्पसंख्यक छोटे-छोटे समुदाय हैं और देश भर में फैले हैं, हमें इनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना चाहिए।

उत्तर :

सभी अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के आधार पर व उसी अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए अनुपातिक मत प्रणाली का कोई एक तरीका प्रयोग करना चाहिए जिससे सभी अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके | भारत में अनेक धार्मिक जातीय, भाषायी व सासंकृतिक अल्पसंख्यक पाए जाते हैं | जिनके उचित प्रतिनिधित्व के लिए अनुपातिक मत प्रणाली अधिक उपयुक्त है |  

(ग) विभिन्न दलों के बीच सीट और वोट को लेकर कोई विसंगति नहीं रखनी चाहिए।

उत्तर :

इस वर्ग के लोगों की इच्छा को पूरा करने के लिए अनुपातिक मत प्रणाली का लिस्ट प्रणाली प्रयोग में लाया जा सकता है | जिसके अनुसार राजनितिक दलों को मिलने वाली वोटों व उनके द्वारा प्राप्त सीटों में एक निश्चत अनुपात पाया जा सकता है | 

(घ) लोग किसी अच्छे प्रत्याशी को चुनने में समर्थ होने चाहिए भले ही वे उसके राजनीतिक दल को पसंद न करते हों

उत्तर :

फ.पा.टी.पो. प्रणाली में नागरिक अपनी पसंद का उम्मीदवार चुन सकते है भले वे उस उम्मीदवार के राजनितिक दल को पसंद ना करते हो | 

Q9. एक भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कई विचार सामने आये। एक विचार यह था कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्र नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसे विकल्प की संभावना कायम रखने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी। इस कारण, भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप इसमें किस पक्ष से सहमत हैं और क्यों?

उत्तर :

 यह सही है की एक मुख्य चुनाव आयुक्त अवकाश ग्रहण करने के बाद एक राजनितिक दल की सदस्यता ली व उस राजनितिक दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ा | यह भी सही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त भी एक नागरिक है व उस रु में उसके अपने राजनितिक अधिकार है जिसके आधार पर वह किसिं राजनितिक दल की सदस्यता प्राप्त क्र सकता है व चुनाव भी लड़ सकता है | परन्तु चुनाव आयुक्त क्योंकि उस पद पर स्वयं रह चूका है जो चुनाव की प्रक्रिया को नियंत्रित करते है | तथा वह चुनाव को प्रभावित करता है अत: उचित यह रहेगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त राजनीती से दूर रहे व किसी प्रकार का चुनाव आदि ना लड़े | 

Q10. भारत का लोकतंत्र अब अनगढ़ ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिध्यात्मक प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार हो चुका है’ क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस कथन के पक्ष अथवा विपक्ष में तर्क दें।

उत्तर :

वर्तमान में भारत में फ.पा.टी.पो.प्रणाली लो अपनाया गया है जिसमे प्रत्येक नागरिक अपनी पसंद के उम्मीदवार के पक्ष में अपना मत व्यक्त करता है चुनाव की समाप्ति के बाद मत की गणना की जाती है जिस उम्मीदवार को बहुमत मिलता है उसे विजयी घोषित क्र दिया जाता है लेकिन कुछ चुनाव में जैसे राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति व राज्यसभा के चुनाव अनुपातिक मत प्रणाली से किये जाते हैं जिसमे मतदाता अलग - अलग उम्मीदवारों के प्रति अपनी पसंद व्यक्त करते है |

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

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