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Chapter-7. जीवों में विविधता Science class 9 in hindi Medium CBSE Notes

CBSE Class 9 Science Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.

Chapter-7. जीवों में विविधता Science class 9 in hindi Medium CBSE Notes
Updated on: 27 March 2026

7. जीवों में विविधता

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एनिमेलिया (जन्तु जगत) | जीवों का गुण (features) | वर्गीकरण का आधार | नोटोकॉर्ड

अध्याय 7. जीवों में विविधता 


एनिमेलिया (Animelia): 

इस जगत को प्राणी जगत भी कहते हैं | तथा इस जगत के उपसमूह को फाइलम (Phylum) कहते है, तथा इनके गुण निम्नलिखित हैं | 

इस वर्ग के जीवों का गुण (features):

(i) इस वर्ग में ऐसे सभी बहुकोशिक यूकेरियोटी जीव आते हैं |

(ii) इनमें कोशिका भित्ति नहीं पाई जाती है।

(iii) इस वर्ग के जीव विषमपोषी होते हैं।

(iv) इसके अधिकतर जन्तु चलायमान (mobile) होते हैं | 

प्राणी जगत के जीवों के वर्गीकरण का आधार : 

(i) सर्वप्रथम इस जगत के जीवों के विभाजन का आधार बनाया गया है कोशिकीय स्तर की संरचना तथा दूसरा उतक स्तर की संरचना | 

(ii) उसके बाद बिना देहगुहा धारी जीवों, कूट (छदम) देहगुहाधारी, तथा देहगुहाधारी जैसे गुणों को वर्गीकरण का आधार बनाया गया हैं | 

(iii) उसके बाद भ्रूण के विकास के समय एक कोशिका से मेसोडर्म की कोशिका का विकास तथा अंतःस्तर की एक थैली से देहगुहा का बनना जैसे लक्षणों को आधार बनाया गया है | 

(iv) उसके बाद इस जगत के जीवों में नोटोकोर्ड की उपस्थिति को विभाजन का आधार बनाया गया है | 

(v) उसके बाद जिन जीवों में नोतोकोर्ड पाया जाता है उनकों आगे कशेरुकी और अकशेरुकी में विभाजित किया गया है | 

1. पोरीफेरा (Porifera)

पोरीफेरा फाइलम के जीवों के गुण :

(i) ये अचल जीव होते हैं, जो किसी आधार से चिपके रहते हैं |

(ii) इनके पुरे शरीर में अनेक छिद्र पाए जाते हैं | ये छिद्र शरीर में उपस्थित नाल प्रणाली से जुड़े होते हैं | 

(iii) इनका शरीर कठोर आवरण अथवा बाह्य कंकाल से ढका होता है | 

(iv) इनकी शारीरिक संरचना अत्यंत सरल होती है, जिनमें उतकों का विभेदन नहीं होता हैं | 

(v) इन्हें समान्यत: स्पंज के नाम से जाना जाता है | 

(vi) ये समुद्री आवास में पाए जाते हैं | 

उदाहरण: साइकॅान, यूप्लेक्टेला, स्पांजिला इत्यादि।

2. सीलेंटरेटा

सीलेंटरेटा फाइलम के जीवों के गुण: 

(i) ये जलीय जंतु हैं।

(ii) इनका शारीरिक संगठन ऊतकीय स्तर का होता है।

(iii) इनमें एक देहगुहा पाई जाती है।

(iv) इनका शरीर कोशिकाओं की दो परतों (आंतरिक एवं बाह्य परत) का बना होता है।

(v) इनकी कुछ जातियाँ समूह में रहती हैं |

उदाहरण: कोरल, हाइड्रा, समुद्री एनीमोन और जेलीफिश इत्यादि |

3. प्लेटीहेल्मिन्थीज

प्लेटीहेल्मिन्थीज फाइलम के जीवों के गुण: 

(i) पूर्ववर्णित वर्गों की अपेक्षा इस वर्ग के जंतुओं की शारीरिक संरचना अधिक जटिल होती है।

(ii) इनका शरीर द्विपार्श्वसममित होता है अर्थात् शरीर के दाएँ और बाएँ भाग की संरचना समान होती है।

(iii) इनका शरीर त्रिकोरक (Triploblastic) होता है अर्थात् इनका ऊतक विभेदन तीन कोशिकीय स्तरों से हुआ है।

(iv) इससे शरीर में बाह्य तथा आंतरिक दोनों प्रकार के अस्तर बनते हैं तथा इनमें कुछ अंग भी बनते हैं।

(v) इनमें वास्तविक देहगुहा का अभाव होता है जिसमें सुविकसित अंग व्यवस्थित हो सकें।

(vi) इनका शरीर पृष्ठधारीय एवं चपटा होता है। इसलिए इन्हें चपटे कृमि भी कहा जाता है।

इनमें प्लेनेरिया जैसे कुछ स्वछंद जंतु तथा लिवरफ्लूक, जैसे परजीवी हैं।

उदाहरण: प्लेनेरिया,  लिवरफ्लूक और फीताकृमि (Tape worm) इत्यादि | 

4. निमेटोडा

निमेटोडा फाइलम के जीवों के गुण: 

(i) ये भी त्रिकोरक जंतु हैं तथा इनमें भी द्विपार्श्व सममिति पाई जाती है, लेकिन इनका शरीर चपटा ना होकर बेलनाकार होता है।

(ii) इनके देहगुहा को  कूटसीलोम कहते हैं। इसमें ऊतक पाए जाते हैं परंतु अंगतंत्रा पूर्ण विकसित नहीं होते हैं।

(iii) इनकी शारीरिक संरचना भी त्रिकोरिक होती है। ये अधिकांशत: परजीवी होते हैं।

(iv) परजीवी के तौर पर ये दूसरे जंतुओं में रोग उत्पन्न करते हैं।

उदाहरणार्थ- गोल कृमि, फाइलेरिया कृमि, पिन कृमि, एस्केरिस और वुचेरेरिया इत्यादि।

5. एनीलिडा

एनीलिडा फाइलम के जीवों के गुण: 

(i) एनीलिड जंतु द्विपार्श्वसममित एवं त्रिकोरिक होते हैं।

(ii) इनमें वास्तविक देहगुहा भी पाई जाती है। इससे वास्तविक अंग शारीरिक संरचना में निहित रहते हैं।

(iii) अतः अंगों में व्यापक भिन्नता होती है। यह भिन्नता इनके शरीर के सिर से पूँछ तक एक के बाद एक खंडित रूप में उपस्थित होती है।

(iv) जलीय एनीलिड अलवण एवं लवणीय जल दोनों में पाए जाते हैं।

(v) इनमें संवहन, पाचन, उत्सर्जन और तंत्रिका तंत्रा पाए जाते हैं।

(vi) ये जलीय और स्थलीय दोनों होते हैं।

उदाहरण: केंचुआ, नेरीस, जोंक इत्यादि | 

6. आर्थ्राेपोडा : यह जंतु जगत का सबसे बड़ा संघ है।

आर्थ्राेपोडा फाइलम के जीवों के गुण: 

(i) इनमें द्विपार्श्व सममिति पाई जाती है और शरीर खंडयुक्त होता है।

(ii) इनमें खुला परिसंचरण तंत्रा पाया जाता है। अतः रुधिर वाहिकाओं में नहीं बहता।

(iii) देहगुहा रक्त से भरी होती है।

(iv) इनमें जुड़े हुए पैर पाए जाते हैं।

उदाहरण: झींगा, तितली, मक्खी, मकड़ी, बिच्छू केकड़े इत्यादि | 

7. मोलस्का

मोलस्का फाइलम के जीवों के गुण: 

(i) इनमें भी द्विपार्श्वसममिति पाई जाती है।

(ii) इनकी देहगुहा बहुत कम होती है तथा शरीर में थोड़ा विखंडन होता है।

(iii) अधिकांश मोलस्क जंतुओं में कवच पाया जाता है।

(iv) इनमें खुला संवहनी तंत्रा तथा उत्सर्जन के लिए गुर्दे जैसी संरचना पाई जाती है।

उदाहरण: घोंघा, सीप इत्यादि | 

8. इकाइनोडर्मेटा : ग्रीक में इकाइनॉस का अर्थ है, जाहक (हेजहॉग) तथा डर्मा का अर्थ है, त्वचा। अतः इन जंतुओं की त्वचा काँटों से आच्छादित होती है।

इकाइनोडर्मेटा फाइलम के  जीवों के गुण: 

(i)  ये मुक्तजीवी समुद्री जंतु हैं।

(ii) ये देहगुहायुक्त त्रिकोरिक जंतु हैं।

(iii) इनमें विशिष्ट जल संवहन नाल तंत्रा पाया जाता है, जो उनके चलन में सहायक हैं।

(iv) इनमें कैल्शियम कार्बोनेट का कंकाल एवं काँटे पाए जाते हैं।

उदाहरण: स्टारपि़ फश, समुद्री अखचन, इत्यादि | 

नोटोकॉर्ड : नोटोकॉर्ड छड़ की तरह की एक लंबी संरचना है जो जंतुओं के पृष्ठ भाग पर पाई जाती है। यह तंत्रिका ऊतक को आहार नाल से अलग करती है। यह पेशियों के जुड़ने का स्थान भी प्रदान करती है जिससे चलन में आसानी हो | 

9. प्रोटोकॉर्डेटा

प्रोटोकॉर्डेटा फाइलम के जीवों के गुण: 

(i) ये द्विपार्श्वसममित, त्रिकोरिक एवं देहगुहा युक्त जंतु हैं।

(ii) इनमें नोटोकॉर्ड पाया जाता है ।

(iii) ये समुद्री जन्तु हैं | 

उदाहरण: बैलैनाग्लोसस, हर्डमेनिया, एम्पिफयोक्सस, इत्यादि | 

 

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