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Chapter-Chapter 9. व्यावसायिक वित्त Business Study class 12 in hindi Medium CBSE Notes

CBSE Class 12 Business Study Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.

Chapter-Chapter 9. व्यावसायिक वित्त Business Study class 12 in hindi Medium CBSE Notes
Updated on: 05 March 2026

Chapter 9. व्यावसायिक वित्त

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अध्याय - 9

वित्तीय प्रबंधन

व्यवसायिक वित - व्यावसायिक गतिविधिओ को चलाने के लिए जिस धन की आवश्यकता होती है, उसे व्यावसायिक वित कहते है |

व्यवसायिक  वित की आवश्यकता -

1. व्यवसाय के स्थापन के लिए |

2. व्यवसाय के संचालन के लिए |

3. व्यवसाय के आधुनिकीकरण के लिए |

4. व्यवसाय के विस्तार के लिए |

5. व्यवसाय के विविधिकरण के लिए |

वित्तीय प्रबंध

वित्तीय प्रबन्ध का अर्थ :- वित्तीय प्रबन्ध को व्यवसाय में प्रयोग किये जाने वाले कोषों का नियोजन करने , प्राप्त करने , नियंत्रण करने एवं प्रशासन करने से सम्बन्धित गतिविधि कहा  जा सकता है| इसका उद्देश्य आवश्यता के समय पयाप्त कोषों को उपलब्ध कराने का विश्वास दिलाना भी होता है तथा अनावश्यक वित्त सा बचाकर रखना होता है | यह धन की लागत का भी काम करता है | संक्षिप्त में, इसका अभिप्राय प्रबंध की उस शाखा से है जिसका संबंध धन की प्रभावी प्राप्ति व उपयोग से है |

वित्तीय प्रबंध के महत्व -

1. स्थाई संपत्तियों का निर्धारण : वित्तीय प्रबंध के अंतर्गत स्थाई संपत्तियों में कुल विनियोग तथा प्रत्येक स्थाई संपत्ति में किए जाने वाले विनियोग का निर्धारण किया जाता है |

2. चालू संपत्तियों का निर्धारण : वित्तीय प्रबंध के अंतर्गत चालू संपत्तियों में कुल विनियोग तथा प्रत्येक चालू संपत्ति पर विनियोग का निर्धारण किया जाता है |

3. दीर्घकालीन व अल्पकालीन वित के अनुपात का निर्धारण : व्यवसाय की कुल वित्तीय आवश्यकता को दीर्घकालीन व अल्पकालीन स्त्रोतों से पूरा किया जाता है | दीर्घकालीन स्त्रोत व्यवसाय में लम्बे समय तक धन उपलब्ध करवाते है जिसके प्रयोग से तरलता बढती है | जिसके कारण दीर्घकालीन स्त्रोतों को अल्पकालीन स्त्रोतों से अधिक लागते सहनी पड़ती है | वित्तीय प्रबंध में तरलता व लागत विश्लेषण करके दोनों वित्तीय स्त्रोतों के अनुपात का निर्धारण किया जाता है |

4. दीर्घकालीन वित्त के विभिन्न स्त्रोतों के अनुपात का निर्धारण : दीर्घकालीन वित्तीय स्त्रोतों में समता अंश पूंजी, पूर्वाधिकार अंश पूंजी, संचित लाभ, ऋणपत्र, दीर्घकालीन ऋण आदि मुख्य है | वित्तीय प्रबंध के अंतर्गत इन विभिन्न दीर्घकालीन वित्तीय स्त्रोतों का अनुपात निश्चित किया जाता है |

5. लाभ - हानि खाते की विहिन्न मदों का निर्धारण : विभिन्न वित्तीय निर्णयों से लाभ - हानि में सम्मिलित मदे प्रभावित होती है | उदाहरण के लिए, ब्याज का संबंध ऋणों की राशि से है |

वित्तीय प्रबंध के उद्देश्य - 

1. धन संपदा को अधिकतम करना : धन संपदा को अधिकतम करने का अभिप्राय अंशधारियो द्वारा व्यवसाय में विनियोजित पूंजी में वृद्धि करना |धन संपदा को अधिकतम करने के लिए अनुकूलतम पूंजी संरचना तथा कोषो का उचित प्रयोग आवश्यक है |

2. तरलता बनाए रखना : कोषो को उचित एवं नियमित आपूर्ति को उचित लागत पर बनाए रखना |

3. कोषो का उचित उपयोग : कोषो का उचित उपयोग ताकि उपव्यय से बचा जा सके |

4. जोखिम को न्यूनतम करना : कोषों को व्यवसाय में इस प्रकार लगाया जाना चाहिए जिससे निवेश में जोंखिम की संभावना यथा संभव कम से कम होनी चाहिए|

वित्त सम्बन्धी निर्णय :- 

1. कुल आवश्यक कोषों का अनुमान लगाना |

2. वित् के विभिन्न श्रोतो की पहचान करना |

3. यह निर्णय लेना की वित् के किस स्रोत से कितना वित्त लेना है |

 

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