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Chapter 5. मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया History class 10 in Hindi Medium ncert book solutions अभ्यास-प्रश्नावली

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Chapter 5. मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया History class 10 in Hindi Medium ncert book solutions अभ्यास-प्रश्नावली

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Chapter 5. मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया

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अभ्यास-प्रश्नावली

Last Update On: 06 March 2026

 

अभ्यास प्रश्नोत्तर:-


1. निम्नलिखित के कारण दें-
(क) वुडब्लॉक प्रिंट या तख़्ती की छपाई यूरोप में 1295 के बाद आई।
(ख) माख्रटन लूथर मुद्रण के पक्ष में था और उसने इसकी खुलेआम प्रशंसा की।
(ग) रोमन कैथलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य से प्रतिबंध्ति किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी।
(घ) महात्मा गांधी ने कहा कि स्वराज की लड़ाई दरअसल अभिव्यक्ति, प्रेस, और सामूहिकता के लिए लड़ाई है।

उत्तर: (क) वुडब्लाॅक वाली छपाई यूरोप में 1295 ई. के पश्चात् आई क्योकि-
(i) यह तकनीक पहले चीन के पास थी।
(ii) मार्को पोलों यह ज्ञान अपने साथ लेकर लौटा।
(iii) मार्को पोला ने यूरोप को गुडब्लाॅक तकनीक से अवगत कराया।
(iv ) यह तकनीक यूरोप में फैल गयी।

(ख) मार्टिन लूथर एक धर्म सुधारक था जिसने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी 95 स्थापनाएँ लिखीं | जल्द ही लूथर के लेख बड़ी तादाद में छापे और पढ़े जाने लगे | कुछ ही हफ़्तों में न्यू टेस्टामेंट के लूथर के तजुर्वे के अनुवाद की 5000 प्रतियाँ बिक गई, और तीन महीने के अंदर दूसरा संस्करण निकलना पड़ा | यह देखकर इतिहासकार भी अब यह मानने लगे कि मुद्रण से नया बौद्धिक माहौल बन गया है | 

(ग) रोमन कैथोलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य से प्रतिबंधित किताबों की सूची इसलिए रखनी शुरू कर दी | क्योंकि इटली के एक किसान नेनोकियों ने नई छपी किताबों के आधार पर ईश्वर और सृष्टि के बारे में ऐसे विचार बनाया कि रोमन कैथोलिक चर्च उसके इस व्यवहार से क्रुद्ध हो गया | उसके धर्म विरोधी विचारों और उस पर उठाए जा रहे सवालों से परेशान होकर रोमन चर्च ने प्रकाशनों और कई पुस्तक विक्रेताओं पर पाबंदियां लगा दिया और यहाँ तक वह 1558 ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगे | 

(घ) महात्मा गाँधी ने 1922 में कहा था कि वाणी की स्वतंत्रता, प्रैस की आज़ादी और सामूहिकता की स्वतंत्रता को तब कि अंग्रेजी सरकार अब जनमत को व्यक्त करने और बनाने के लिए इस सभी तीन ताकतवर औजारों को दबाने की कोशिश कर रही है |चूँकि गाँधी जी का मानना था कि स्वराज और खिलाफत की लड़ाई सबसे पहले तो इन संकटग्रस्त आज़ादियों की लड़ाई है | और गाँधी जी का ये भी मानना था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी, प्रैस की आज़ादी और सामूहिकता पर प्रतिबंध लगाने से स्वराज की लड़ाई प्रभावित होगी |
2. छोटी टिप्पणी में इनके बारे में बताएँ-
(क) गुटेन्बर्ग प्रेस
(ख) छपी किताब को लेकर इरैस्मस के विचार
(ग) वर्नाक्युलर या देसी प्रेस एक्ट

उत्तर:  (क) गुटेन्बर्ग प्रेस :- गुटेन्बर्ग ने रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के टाइप बनाए और पर्यटन किया कि उन्हें इधर-उधर 'मूव' कराकर या घुमाकर शब्द बनाए जा सकते हैं| इसीलिए इसे 'मूवेबल त्य्प्र प्रिन्यिंग मशीन' के नाम से जाना गया और यहीं अगले तीन सौ वर्ष तक छपाई की बुनियादी तकनीक रही| यह प्रेस एक घंटे में 250 पन्ने छाप सकती थी| गुटेन्बर्ग की पहली पुस्तक 'बाइबिल' छापी| 

(ख) छपी किताब को लेकर इरैस्मस के विचार :- इरैस्मस लैटिन अमेरिका का एक विद्वान था | वह कैथोलिक सुधारक था | उसने प्रिटिंग प्रैस का पक्ष लिया | उसने छापेखाने के बारे में गहरी चिंता को अभिव्यक्त किया था | 1508 ई. में इन नई पुस्तकों के विचारों को विश्व के कोने-कोने में पहुँचाना चाहता था |  

(ग) वर्नाक्युलर या देसी प्रेस एक्ट :- आईरिस प्रैस कानून के तर्ज पर 1878 में वर्नाकुलर प्रैस एक्ट लागु किया गया | जिससे सरकार को भाषाई प्रैस में छपी रपट और संपादकीय को सेंसर करने का हक मिल गया | वास्तव में यह कानून प्रैस की आज़ादी को समाप्त करने के लिए ही लाई गयी थी | 1857 के विद्रोह के बाद प्रैस की स्वतंत्रता के प्रति सोंच में महत्वपूर्ण बदलाव आया | क्रुद्ध अंग्रेजों ने देशी प्रेस का मुँह बंद करने कि माँग की |  इस एक्ट के अनुसार पहले तो अख़बार को चेतावनी दी जाती थी, और अगर चेतावनी की अखबार ने अनसुनी की तो उसे जब्त भी किया जा सकता था और छपाई की मशीनें छीन ली जाती थी | 
3. उन्नीसवीं सदी में भारत में मुद्रण-संस्कृति के प्रसार का इनके लिए क्या मतलब थाμ
(क) महिलाएँ
(ख) गरीब जनता
(ग) सुधारक

उत्तर: (क) महिलाएँ :- 

(i) मुद्रण संस्कृति के विकसित होने से किताबों में महिलाओं की जीवन ,उनकी समस्याएँ और उनकी भावनाओं के बारे में बहुत कुछ लिखा जाने लगा । धीरे धीरे परिवार के विभिन्न सदस्य महिलाओं को पढ़ाने लिखाने लगे  ।
(ii) कैलाशबशिनी देवी जैसी लेखिकाओं ने जब महिलाओं के लिए लेख लिखना शुरू किया और उनके अधिकार के बारे में बताया जिसे पढ़कर महिलाओं को अपने स्थिति का पता चला । 
(iii) जब महिलाँए पढ़ना लिखना सिख लिया तो वे रोजगार की माँग करने लगी । 

(ख) गरीब जनता :-

(i) मद्रासी शहरों में सस्ती पुस्तके चौक-चौराहों पर बेचीं जाने से गरीब जनता भी उन्हें खरीद सकती थी| 

(ii) प्राचीन धर्मग्रंथों की आलोचनाए भी की गई| 

(iii) जातिभेद पर पुस्तके और निबंध लिखे गए, जैसे ज्योतिबा फुले की गुलाम गिरी|

(iv) ,मजदूरों को बुरी आदतों, जैसे नशाखोरी को कम करके उन तक राष्ट्रवाद का सन्देश पहुचना था|
(ग) सुधारक:-

(i) विधवा विवाह, एकेश्वरवाद, मूर्ति पूजा, आदि विषयों पर वाद-विवाद हुए| तर्क-वितर्क समाज में लोगो के समक्ष आए| इन्हें आमभाषा में छपा जाता था, इस प्रकार प्रिंट ने वाद-विवाद को जनसाधारण तक पहुचाया|

(ii) मुद्रण संस्कृति उलमा के लिए भी महत्वपूर्ण थी| उलमा मुस्लिम राजवंशो के पतन से चिंतित थे| उन्हें धर्मातरण या मुस्लिम कानून को बदलने का डर था|  

(iii) समाचार पत्रों में सब तर्क-वितर्क, वाद-विवाद, विचार प्रकाशित होते थे| जिसके फलस्वरूप जनसाधारण इनमें भाग ले सकते थे तथा इससे के नए विचार उभरे|

चर्चा करे:-

1. अठारहवीं सदी के यूरोप में कुछ लोगों को क्यों ऐसा लगता था कि मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अंत, और ज्ञानोदय होगा?

उत्तर: मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अंत, और ज्ञानोदय की आशा के निम्नलिखित कारण थे-

(i) बहुत लोगो का मन्ना था की किताबे दुनिया बदल सकती हैं| वे निरंकुशवाद और आतंकी राजसत्ता में समाज को मुक्ति दिलाकर ऐसा दौर लाएंगी जब विवेक और बुद्धि का राज़ होगा|

(ii) मार्सिये के उपन्यासों के नायकों में अक्सर पुस्तके पढने से परिवर्तन आ जाता हैं| वें नायक किताबों की दुनिया में जीते हैं और इसी क्रम में ज्ञान प्राप्त करते हैं| 

2. कुछ लोग किताबों की सुलभता को लेकर चिंतित क्यों थे? यूरोप और भारत से एक-एक उदाहरण लेकर समझाएँ।

उत्तर: कुछ लोग किताबों की सुलभता को लेकर चिंतित होने के निम्न्लिखित कारण थे-

(i) ' मूल्यवान' साहित्य का महत्त्व समाप्त होने की आशंका थी|

(ii) भारत में दकियासूनी मुसलमानों को डर था कि पुस्तकों की सुलभता के कारण उर्दू के रूमानी अफसाने पढ़कर औरते बिगड़ जाएंगी|

(iii) यूरोप में पुस्तकों की सुलाभता के परिणामस्वरूप मार्टिन लूथर ने कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना की और अपनी 95 स्थापनाए लिखी| 
3. उन्नीसवीं सदी में भारत में गरीब जनता पर मुद्रण संस्कृति का क्या असर हुआ?

उत्तर: उन्नीसवीं सदी में भारत में गरीब जनता पर मुद्रण संस्कृति का असर निम्नलिखित हुआ -

(i) मद्रासी शहरों में काफी सस्ती पुस्तके विभिन्न स्थान पर बेंची जाने लगीं जिनको गरीब जनता खरीद सकती थी|

(ii) सार्वजनिक पुस्तकालय खोले जाने लगे जिससे गरीबों की पुस्तकों तक पहुँच में वृद्धि हुई|

(iii) मजदूरों के मध्य नशाखोरी कम करने, साक्षरता में वृद्धि करने तथा रह्त्र्वाद का सन्देश पहुचाने में मुद्रण संस्कृति का महत्वपूर्ण योगदान रहा|
4. मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की?

उत्तर:(i) दमनकारी नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अखबार देश के हर कोने मे बढ़ते - फैलते गए।
(ii) उन्होंने औपनिवेशिक कुशासन के बारे में लिखा।
(iii) पंजाब के क्रांतिकारियों को गिरतार किया गया तो बाल गंगाधर तिलक ने
अपना केसरी समाचार छापा तथा लोगों ने गहरी हमदर्दी जताई।
(iv) पंजाब तथा देश के अन्य भागों में राष्ट्रवादी आंदोलन को बल मिला।
(v) इस कारण बाल गंगाधनर तिलक को कैद कर लिया गया जिसका पूरे भारत मे विरोध हुआ।

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