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Chapter-मुद्रा एवं बैंकिंग Macro Economics class 12 in hindi Medium CBSE Notes

CBSE Class 12 Macro Economics Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.

Chapter-मुद्रा एवं बैंकिंग Macro Economics class 12 in hindi Medium CBSE Notes
Updated on: 05 March 2026

मुद्रा एवं बैंकिंग

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मुद्रा और बैंकिंग 

मुद्रा - मुद्रा एक उपकरण है जिसका प्रयोग विनिमय के माध्यम के रूप में किया जाता है |

वस्तु विनिमय प्रणाली - वस्तु विनिमय प्रणाली वह प्रणाली है जिसमें वस्तु का विनिमय वस्तु से किया जाता है | इस प्रणाली में वस्तुओं का ही लेन - देन होता है | जैसे - गेहूँ के बदले चावल, कपडे के बदले दाल आदि का विनिमय |

वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ या अवगुण -

1. आवश्यकताओं का दोहरा संयोग -  आवश्यकताओं का दोहरा संयोग वह स्थति है जब दो लोगो को ऐसी दो वस्तुओं की जरूरत है जिनका वे आपस में विनिमय कर   या लेन - देन कर अपनी आवश्यकताओं की सतुष्टी करना चाहते हो | लेकिन यह बहुत कठिन है क्योंकि ऐसे व्यक्ति को खोजना जिसके पास आपकी जरुरत की वस्तु हो और आपको जिस वस्तु की जरुरत है वह उसके पास हो |

2. मूल्य की एक समान इकाई का आभाव - वस्तु विनिमय प्रणाली में किसी वस्तु का उचित मूल्य तथा एक समान इकाई निर्धारित करना संभव नहीं होता है | जिसके कारण विनिमय करना कठिन हो जाता है |  

3. भविष्य में किए जाने वाले ठेकों के भुगतानों में कठिनाई - वस्तु विनिमय प्रणाली भविष्य में किए जाने वाले ठेकों के भुगतानों में काफी कठिनाई आती है | जैसे आप एक अपने कर्मचारी को 10,000 प्रति महिना देने का समझौता करते है तो क्या आप उसे गेहूँ, टेबल, या चावल देंगे | मुद्रा ने इसे काफी सरल बना दिया है | 

4. बचत या बचत हस्तांतरण में कठिनाई - आज के युग में बचत का काफी महत्व | हम बचत सुरक्षित भविष्य तथा निवेश के लिए करते है परन्तु वस्तु विनिमय प्रणाली में बचत करना तथा बचत को एक जगह से दूसरी जगह हस्तांतरित करना अत्यंत कठिन कार्य है | वस्तु विनिमय प्रणाली में हम बचत वस्तु के रूप में करते है जिसमे पूँजीगत हानि होने का भय बना रहता है जैसे वस्तु का ख़राब हो जाना आदि | 

मुद्रा के प्रकार -

(i) आदेश मुद्रा - आदेश मुद्रा वह मुद्रा होती है जो सरकार के आदेश द्वारा जारी की जाती है | यह उस देश के लोगो द्वारा क़ानूनी तौर पर विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार की जाती है | 

(ii) न्यास मुद्रा - न्यास मुद्रा वह मुद्रा होती है जो प्राप्तकर्ता और अदाकर्ता के बीच विश्वास पर आधारित होती है तथा विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार की जाती है |

(iii) पूर्णकाय मुद्रा - पूर्णकाय मुद्रा वह मुद्रा होती है जिसका वस्तु मूल्य मौद्रिक मूल्य के बराबर होता है | जिसमे सिक्के शामिल है |

(iv) साख मुद्रा - साख मुद्रा वह मुद्रा होती है जिसका मौद्रिक मूल्य वस्तु मूल्य से अधिक होता है | इसमे नोट शामिल है |

मुद्रा के कार्य -

मुख्यतः मुद्रा के दो कार्य है जैसे:

1. मुद्रा के प्राथमिक कार्य -

(i) विनिमय का माध्यम - मुद्रा एक ऐसा उपकरण है जिसका प्रयोग विनिमय के माध्यम के रूप में किया जाता है | वस्तुओं तथा सेवाओं के क्रय विक्रय में मुद्रा एक माध्यम का कार्य करती है | मुद्रा के बीना वस्तु का विनिमय वस्तु में किया जाता था, जिससे विनिमय काफी कठिन हो था | लेकिन मुद्रा ने क्रय तथा विक्रय गतिविधियों को अलग कर दिया है |

(ii) मूल्य की इकाई - मुद्रा किसी भी वस्तु तथा सेवा का उचित मूल्य निर्धारित करने में सहायता करती है | प्रत्येक वस्तु तथा सेवा का मूल्य मुद्रा के रूप में मापा जा सकता है | जबकि वस्तु विनिमय प्रणाली में वस्तु का विनिमय वस्तु से किया जाता | मुद्रा की तरह मूल्य की कोई साझी (Common) इकाई नहीं थी |

2. मुद्रा के गौण या सहायक कार्य -

(i) स्थगित भुगतानों का मान - स्थगित भुगतान वह होते है जिनका भुगतान अभी न करके भविष्य में किसी समय किया जाता है | मुद्रा के कारण भविष्य में किये जाने वाले भुगतानों का भुगतान करना सरल हो गया है | ऐसे भुगतानों का भुगतान वस्तुओं त्राता सेवाओं के रूप में करना कठिन होता है | मुद्रा के इस कार्य के कार्य के कारण 'वितीय बाजार' की उत्पति हुई है तथा निवेश में कई गुना वृद्धि हुई है | 

(ii) मूल्य का संचय - मूल्य का संचय का अर्थ है धन का संचय | आज के युग में बचत का काफी महत्व, हम बचत सुरक्षित भविष्य तथा निवेश के लिए करते है | मुद्रा के कारण धन का संचय करना काफी आसन हो गया | अब धन को आसानी से कागजी मुद्रा के रूप में संचित करके रखा जा सकता है | जबकि वस्तु विनिमय प्रणाली में धन का संचय वस्तु के रूप में किया जाता था, जिसमे टूट-फुट तथा पूंजीगत हानि का भय रहता था |

(iii) मूल्य का हस्तांतरण - मुद्रा ने धन के हस्तांतरण को काफी सरल कर दिया है | जबकि वस्तु विनिमय प्रणाली में धन को वस्तु के रूप में एक जगह से दूसरी जगह हस्तांतरित करना काफी कठिन कार्य था | मुद्रा के इस कार्य के कारण अंतररास्ट्रीय बाजार की उत्पति हुई है तथा FDI सरल हो गया है | 

मुद्रा की पूर्ति - मुद्रा की पूर्ति से अभिप्राय एक निश्चित समय पर देश में लोगो के पास कुल मुद्रा के स्टॉक से है |

मुद्रा के उत्पादक -

(i) देश की सरकार |

(ii) देश की बैंकिंग व्यवस्था | जैसे - केद्रीय बेंक तथा वाणिज्यिक बैंक |

 

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