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Chapter-Chapter 9. औद्योगिक क्रांति History class 11 in hindi Medium CBSE Notes


Last Updated : July 20, 2026

CBSE Class 11 History Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.

Chapter-Chapter 9. औद्योगिक क्रांति History class 11 in hindi Medium CBSE Notes
Updated on: 20 July 2026

Chapter 9. औद्योगिक क्रांति

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अविष्कारों का दौर

अध्याय 9. औद्योगिक क्रांति (Part 2)

अध्याय परिचय : औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से केवल उद्योगों का ही विकास नहीं हुआ, बल्कि परिवहन, संचार, खनन, नगरों तथा सामाजिक जीवन में भी व्यापक परिवर्तन आए। कोयला और लौह उद्योगों के विस्तार, रेलमार्गों के निर्माण तथा कारखानों की संख्या बढ़ने से एक नए औद्योगिक समाज का निर्माण हुआ। इस भाग में परिवहन क्रांति, लौह एवं कोयला उद्योग, औद्योगिक नगरों तथा श्रमिक वर्ग का अध्ययन किया गया है।

परिवहन क्रांति

यातायात के साधनों का विकास

औद्योगिक क्रांति के दौरान परिवहन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार हुए। पहले वस्तुओं के परिवहन में अधिक समय और लागत लगती थी, लेकिन सड़कों, नहरों, रेलमार्गों तथा भाप से चलने वाले जहाजों के विकास से परिवहन तेज, सुरक्षित और सस्ता हो गया।

परिवहन क्रांति ने उद्योगों और व्यापार के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परिवहन क्रांति की प्रमुख विशेषताएँ

  • सड़कों का विकास।
  • नहरों का निर्माण।
  • रेलमार्गों की स्थापना।
  • भाप से चलने वाले जहाजों का उपयोग।
  • व्यापार में तीव्र वृद्धि।

रेलमार्गों का विकास

रेल परिवहन की शुरुआत

भाप इंजन के आविष्कार के बाद रेल परिवहन का तीव्र विकास हुआ। रेलमार्गों के माध्यम से कच्चा माल कारखानों तक और तैयार वस्तुएँ बाजारों तक शीघ्र पहुँचने लगीं।

रेल परिवहन ने औद्योगिक क्रांति को नई गति प्रदान की तथा दूर-दराज़ के क्षेत्रों को आपस में जोड़ दिया।

रेलमार्गों के प्रमुख लाभ

  • तेज़ और सस्ता परिवहन।
  • व्यापार का विस्तार।
  • औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि।
  • क्षेत्रीय संपर्क मजबूत हुआ।

भाप से चलने वाले जहाज

समुद्री परिवहन में परिवर्तन

भाप इंजन के उपयोग से समुद्री जहाजों की गति और क्षमता में वृद्धि हुई। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नया विस्तार मिला तथा विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान अधिक सरल हो गया।

भाप जहाजों के प्रमुख लाभ

  • समुद्री यात्रा तेज हुई।
  • व्यापारिक संपर्क बढ़ा।
  • माल परिवहन आसान हुआ।
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिला।

कोयला उद्योग का विकास

ऊर्जा का प्रमुख स्रोत

औद्योगिक क्रांति के समय कोयला उद्योगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत था। भाप इंजन को चलाने तथा लौह उद्योग के विकास में कोयले की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

कोयले की बढ़ती माँग के कारण खानों का विस्तार हुआ और खनन उद्योग तेजी से विकसित हुआ।

कोयला उद्योग का महत्व

  • भाप इंजन के लिए ईंधन।
  • कारखानों को ऊर्जा की आपूर्ति।
  • लौह उद्योग का विकास।
  • खनन उद्योग का विस्तार।

लौह उद्योग (Iron Industry)

भारी उद्योगों का विकास

औद्योगिक क्रांति के दौरान लौह उद्योग का तेजी से विकास हुआ। मशीनों, रेल पटरियों, पुलों तथा कारखानों के निर्माण में लोहे का व्यापक उपयोग होने लगा।

कोयले और लौह अयस्क की उपलब्धता ने इस उद्योग को और अधिक मजबूत बनाया।

लौह उद्योग के प्रमुख उपयोग

  • मशीनों का निर्माण।
  • रेल पटरियों का निर्माण।
  • पुलों का निर्माण।
  • कारखानों की स्थापना।
  • जहाज निर्माण।

औद्योगिक नगरों का विकास

नए नगरों का उदय

कारखानों की स्थापना के कारण बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में गाँवों से नगरों की ओर आने लगे। इससे मैनचेस्टर, बर्मिंघम और लिवरपूल जैसे नगर तेजी से विकसित हुए।

इन नगरों में उद्योग, व्यापार और परिवहन की सुविधाएँ तेजी से बढ़ीं।

प्रमुख औद्योगिक नगर

  • मैनचेस्टर (Manchester)
  • बर्मिंघम (Birmingham)
  • लिवरपूल (Liverpool)
  • लीड्स (Leeds)
  • शेफील्ड (Sheffield)

श्रमिक वर्ग का उदय

नए सामाजिक वर्ग का निर्माण

कारखानों के विकास के साथ एक नए औद्योगिक श्रमिक वर्ग का उदय हुआ। ये श्रमिक कारखानों में निश्चित मजदूरी पर कार्य करते थे। अधिकांश श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे और उनका जीवन कठिन परिस्थितियों में व्यतीत होता था।

श्रमिक वर्ग की प्रमुख विशेषताएँ

  • मजदूरी पर आधारित जीवन।
  • कारखानों में कार्य।
  • लंबे कार्य घंटे।
  • कम वेतन।
  • कठिन कार्य परिस्थितियाँ।

कारखानों में कार्य की परिस्थितियाँ

श्रमिकों की समस्याएँ

प्रारंभिक औद्योगिक काल में श्रमिकों को प्रतिदिन 12 से 16 घंटे तक कार्य करना पड़ता था। कार्यस्थलों पर सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी तथा मजदूरी भी कम मिलती थी।

महिलाओं और बच्चों से भी कठोर परिस्थितियों में काम कराया जाता था।

श्रमिकों की प्रमुख समस्याएँ

  • लंबे कार्य घंटे।
  • कम मजदूरी।
  • असुरक्षित कार्यस्थल।
  • बाल श्रम।
  • महिलाओं का शोषण।

महिलाओं और बच्चों की स्थिति

औद्योगिक समाज की चुनौतियाँ

औद्योगिक क्रांति के दौरान महिलाओं और बच्चों को भी कारखानों में कार्य करना पड़ता था। उन्हें पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती थी तथा कार्य परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन थीं।

प्रमुख समस्याएँ

  • कम वेतन।
  • लंबे कार्य घंटे।
  • शिक्षा से वंचित होना।
  • स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ।

श्रमिक संगठनों का विकास

श्रमिक अधिकारों की माँग

श्रमिकों की कठिन परिस्थितियों के कारण धीरे-धीरे श्रमिक संगठनों (Trade Unions) का गठन होने लगा। इन संगठनों ने उचित मजदूरी, कम कार्य समय तथा सुरक्षित कार्यस्थलों की माँग की।

श्रमिक आंदोलनों के उद्देश्य

  • उचित मजदूरी।
  • कार्य समय में कमी।
  • सुरक्षित कार्यस्थल।
  • बाल श्रम पर रोक।
  • श्रमिक अधिकारों की रक्षा।

धमनभट्टी का अविष्कार : प्रथम अब्राहम डर्बी (1677-1717) द्वारा किया गया | 

धमनभट्टी के अविष्कार के लाभ : 

(i) इसमें सर्वप्रथम 'कोक' का इस्तेमाल किया गया | कोक में उच्च ताप उत्पन्न करने की शक्ति थी | और यह पत्थर कोयले से गंधक तथा अपद्रव्य निकलकर तैयार किया जाता था | 

(ii) भट्ठियों को काठकोयले पर निर्भर नहीं रहना पड़ा | 

(iii) इससे निकला हुआ लोहा से पहले की अपेक्षा अधिक बढ़िया और लंबी ढलाई की जा सकती थी | 

पिटवा लोहे का विकास : द्वितीय डर्बी (1711-68) से ढलवा लोहे से पिटवां लोहे का विकास किया,

जो कम भंगुर था | 

आलोडन भट्टी : हेनरी कोर्ट (1740-1823) ने आलोडन भट्टी और बेलन मिल का अविष्कार किया, जिसमें परिशोधित लोहे से छड़ें तैयार करने के लिए भाप की शक्ति का इस्तेमाल किया जाता था | 

इस अविष्कार से लोहे के अनेकानेक उत्पाद बनाना संभव हो गया |

जॉन विल्किंसन द्वारा बनाये गए लोहे का औजार : जॉन विल्किंसन ने सर्वप्रथम

(i) लोहे की कुर्सियां,  (ii) आसव (iii) शराब की भट्ठियों के लिए टंकियाँ (iv) लोहे की सभी आकारों के लिए नालियाँ (पाइप) बनाई | 

ब्रिटेन में जहाज-निर्माण और नौपरिवहन का व्यापार बढ़ने का कारण : 

(i) लोहा उद्योग कुछ क्षेत्रों में कोयला खनन तथा लोहा प्रगलन की मिली-जुली इकाइयों के रूप में केन्द्रित हो गया था | 

(ii) एक ही पट्टियों में उत्तम कोटि का कोकिंग कोयला और उच्च-स्तर का लौह खनिज साथ-साथ पाया जाता था | ये द्रोणी-क्षेत्र पत्तनों के पास ही थे | 

(iii) वहाँ ऐसे पाँच तटीय कोयला-क्षेत्र थे जो अपने उत्पादों को लगभग सीधे ही जहाजों में लदवा सकते थे।

ब्रिटेन में लौह उद्योग के फलने-फूलने का कारण : 

(i) ब्रिटेन के लौह उद्योग ने 1800 से 1830 के दौरान अपने उत्पादन को चौगुना बढ़ा लिया और
उसका उत्पादन पूरे यूरोप में सबसे सस्ता था।

(ii) 1820 में, एक टन ढलवाँ लोहा बनाने के लिए 8 टन कोयले की जरूरत होती थी, किन्तु 1850 तक आते-आते यह मात्रा घट गई और केवल 2 टन कोयले से ही एक टन ढलवाँ लोहा बनाया जाने लगा।

(iii) 1848 तक यह स्थिति आई कि ब्रिटेन द्वारा पिघलाए जाने वाले लोहे की मात्रा बाकी सारी दुनिया द्वारा कुल मिलाकर पिघलाए जाने वाले लोहे से अधिक थी।

स्पिनिंग जेनी : यह एक कताई मशीन है जिसे जेम्स हरग्रिव्ज़ ने 1765 में बनाई | यह एक ऐसी मशीन थी जिसपर एक अकेला व्यक्ति एक साथ कई धागे कात सकता था | जिसके कारण बुनकरों को उनकी आवश्यकता से अधिक तेजी से धागे मिलने लगा | 

म्यूल : यह एक ऐसी मशीन का उपनाम   था जो 1779 में सैम्युअल क्रोम्पटन द्वारा बनाई गई थी | इससे काता हुआ धागा बहुत मजबूत और बढ़िया हुआ करता था | 

कपास उद्योग की दो प्रमुख विशेषताएँ : 

(i) कच्चे माल के रूप में आवश्यक कपास सम्पूर्ण रूप से आयात करना पड़ता था | 

(ii) यह उद्योग प्रमुख रूप से कारखानों में काम करने वाली स्त्रियों तथा बच्चों पर बहुत ज्यादा निर्भर था | 

भाप शक्ति की विशेषताएँ : 

(i) भाप की शक्ति उच्च तापमानों पर दबाव पैदा करती जिससे अनेक प्रकार की मशीनें चलाई जा सकती थीं।

(ii) भाप की शक्ति ऊर्जा का अकेला ऐसा स्रोत था जो मशीनरी बनाने के लिए भी भरोसेमंद और कम खर्चीला था।

भाप की शक्ति का इस्तेमाल : भाप की शक्ति का इस्तेमाल सर्वप्रथम खनन उद्योग में किया गया | 

थॉमस सेवरी के भाप इंजन की कमियाँ : ये इंजन छिछली गहराइयों में धीरे-धीरे काम करते थे, और अधिक दबाव हो जाने पर उनका वाष्पित्र (बॉयलर) फट जाता था।

थॉमस न्यूकोमेंन के भाप इंजन की कमियाँ : इसमें सबसे बड़ी कमी यह थी कि संघनन बेलन (कंडेंसिंग सिलिंडर)  लगातार ठंडा होते रहने से इसकी ऊर्जा खत्म होती रहती थी                 जेम्स वाट के भाप इंजन की विशेषताएँ : 

(i) यह केवल एक साधारण पम्प की बजाय एक प्राइम मूवर (चालक) के रूप में काम करता था |

(ii) इससे कारखानों में शक्तिचालित मशीनों को उर्जा मिलने लगी |

(iii) यह अन्य इंजनों के मुकाबले अधिक शक्तिशाली था, जिससे इसका अधिक इस्तेमाल होने लगा |          

Part 2 का सार

इस भाग में हमने परिवहन क्रांति, रेलमार्गों का विकास, भाप से चलने वाले जहाज, कोयला एवं लौह उद्योग, औद्योगिक नगरों का विकास, श्रमिक वर्ग, कारखानों की कार्य परिस्थितियाँ तथा श्रमिक संगठनों का अध्ययन किया। अगले भाग में औद्योगिक क्रांति के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव, पूँजीवाद, महत्वपूर्ण तथ्य, शब्दावली तथा अध्याय का समग्र सार का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

                                                                                      

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