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Chapter-2. यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति History class 9 in hindi Medium CBSE Notes

CBSE Class 9 History Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.

Chapter-2. यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति History class 9 in hindi Medium CBSE Notes

2. यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति

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यूरोप में समाजवाद और औद्योगिकीकरण

2. यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति 


औद्योगीकरण का दुष्प्रभाव : 

(i) औद्योगीकरण ने औरतों-आदमियों और बच्चों, सबको कारखानों में ला दिया।

(ii) काम के घंटे यानी पाली बहुत लंबी होती थी और मजदूरी बहुत कम थी।

(iii) बेरोजगारी आम समस्या थी। औद्योगिक वस्तुओं की माँग में गिरावट आ जाने पर तो बेरोजगारी और बढ़ जाती थी।

(iv) शहर तेजी से बसते और फैलते जा रहे थे इसलिए आवास और साफ-सफाई का काम भी मुश्किल होता जा रहा था।

समाज की तरक्की को लेकर रैडिकल और उदारवादियों के विचार : 

बहुत सारे रैडिकल और उदारवादियों वेफ पास भी काफी संपत्ति थी और उनके यहाँ बहुत सारे लोग नौकरी करते थे। उन्होंने व्यापार या औद्योगिक व्यवसायों के जरिए धन-दौलत इकट्ठा की थी इसलिए वह चाहते थे कि इस तरह के प्रयासों को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दिया जाए।

(i) उन्हें लगता था कि अगर मजदूर स्वस्थ हों और नागरिक पढ़े-लिखे हों, तो इस व्यवस्था का भरपूर लाभ लिया जा सकता है।

(ii) ये लोग जन्मजात मिलने वाले विशेषाधिकारों के विरुद्ध थे। व्यक्तिगत प्रयास, श्रम और उद्यमशीलता में उनका गहरा विश्वास था।

(iii) उनकी मान्यता थी कि यदि हरेक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता दी जाए, गरीबों को रोजगार मिले, और जिनके पास पूँजी है उन्हें बिना रोक-टोक काम करने का मौका दिया जाए तो समाज तरक्की कर सकता है।

कामकाजी स्त्री पुरुषों का उदारवादी और रैडिकल समूहों से प्रभावित होने के कारण: 

उदारवादी और रैडिकल समूहों की मान्यता थी कि यदि हरेक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता दी जाए, गरीबों को रोजगार मिले, और जिनके पास पूँजी है उन्हें बिना रोक-टोक काम करने का मौका दिया जाए तो समाज तरक्की कर सकता है। इसी कारण उन्नीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में समाज परिवर्तन के इच्छुक बहुत सारे कामकाजी स्त्रा-पुरुष उदारवादी और रैडिकल समूहों व पार्टियों के इर्द-गिर्द गोलबंद हो गए थे।

राष्ट्रवादी, उदारवादी और रैडिकल आंदोलनकारीयों की क्रांति : 

यूरोप में 1815 में जिस तरह की सरकारें बनीं उनसे छुटकारा पाने के लिए कुछ राष्ट्रवादी, उदारवादी और रैडिकल आंदोलनकारी क्रांति के पक्ष में थे। फ्रांस, इटली, जर्मनी और रूस में ऐसे लोग क्रांतिकारी हो गए और राजाओं के तख्तापलट का प्रयास करने लगे। राष्ट्रवादी कार्यकर्ता क्रांति के जरिए ऐसे ‘राष्ट्रों’ की स्थापना करना चाहते थे जिनमें सभी नागरिकों को
समान अधिकार प्राप्त हों।

उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यूरोप में समाजवाद की उन्नति : 

यूरोप में समाज के पुनर्गठन की संभवतः सबसे दूरगामी दृष्टि प्रदान करने वाली विचारधारा समाजवाद ही थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यूरोप में समाजवाद एक जाना-पहचाना विचार था। उसकी तरफ बहुत सारे लोगों का ध्यान आकर्षित हो रहा था। इसके पीछे उनकी प्रखर विचारधारा थी जो निम्नलिखित थी - 

(i) समाजवादी निजी संपत्ति के विरोधी थे। यानी, वे संपत्ति पर निजी स्वामित्व को सही नहीं मानते थे।

(ii) उनका कहना था कि संपत्ति के निजी स्वामित्व की व्यवस्था ही सारी समस्याओं की जड़ है। 

(iii) संपत्तिधारी व्यक्ति को सिर्फ अपने फायदे से ही मतलब रहता है वह उनके बारे में नहीं सोचता जो उसकी संपत्ति को उत्पादनशील बनाते हैं।

(iv) अगर संपत्ति पर किसी एक व्यक्ति के बजाय पूरे समाज का नियंत्रण हो तो साझा सामाजिक हितों पर ज्यादा अच्छी तरह ध्यान दिया जा सकता है।

(v) समाजवादी इस तरह का बदलाव चाहते थे और इसके लिए उन्होंने बड़े पैमाने पर अभियान
चलाया।

कुछ समाजवादियों या विचारकों के विचार: 

1. रॉबर्ट ओवेन (1771-1858) : 

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