Chapter-Chapter 7. रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे Economics-II class 12 in hindi Medium CBSE Notes
CBSE Class 12 Economics-II Notes in Hindi Medium based on latest NCERT syllabus, covering definitions, diagrams, formulas, and exam-oriented explanations.
Chapter 7. रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे
मुद्रा-स्फीति
मुद्रा-स्फीति
मुद्रा-स्फीति : मुद्रा-स्फीति कीमतों में वृद्धि के कारण मुद्रा के मूल्य में गिरावट है | अर्थात मुद्रा के मूल्य में गिरावट और वस्तुओं के समान्य कीमत स्तर में वृद्धि है |
मुद्रा-स्फीति के मानक सूचक :
(i) थोक कीमत सूचकांक (Wholesale Price Index) : यह साप्ताहिक आधार पर थोक कीमतों में परिवर्तन को मापता है | इसमें सिर्फ वस्तुओं की कीमतों को मापा जाता है |
(ii) उपभोक्ता कीमत सूचकांक (Consumer Price Index) : यह मासिक आधार पर खुदरा कीमतों में परिवर्तन को मापता है | इसमें वस्तुओं एवं सेवाओं दोनों को शामिल किया जाता है |
(iii) जीडीपी डिफ्लेक्टर (GDP Deflector) : यह चालू कीमतों पर GDP तथा स्थिर कीमतों पर GDP का अनुपात होता है | यदि जीडीपी डिफ्लेटर का मान 1 है तो इसका तात्पर्य है कि कीमत स्तर में कोई वृद्धि नहीं हुई है |
मुद्रा-स्फीति के परिणाम :
(i) ब्याज की दर बढ़ जाती है |
(ii) निवेश की लागत में वृद्धि होती है |
(iii) लोगों की क्रय क्षमता घट जाती है |
(iv) आगतों कि कीमतों में वृद्धि हो जाती है |
(v) इसके फलस्वरूप महंगाई बढ़ जाती है |
मुद्रा-स्फीति का कारण :
(i) मुद्रा-पूर्ति में वृद्धि : मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि होने से मुद्रा के मूल्य में गिरावट होता है | ऐसा दूसरी पंचवर्षीय योजना की अवधि में देखा गया है |
(ii) घाटे का वित्त व्यवस्था : भारत में घाटे का वित्त व्यवस्था का अर्थ नए नोट छापने की नीति से है | इससे मुद्रा स्फीति में वृद्धि होती है |
(iii) जनसंख्या में वृद्धि : जनसंख्या वृद्धि से वस्तु एवं सेवाओं कि माँग में वृद्दि होता है जिससे कीमत स्तर में वृद्धि होती है |
(iv) उत्पादन में कमी : कम उत्पादन से वस्तुओं की पूर्ति प्रभावित होती है जिससे मूल्य वृद्धि होती है |
(v) मजदूरी में वृद्धि : मजदूरी में वृद्धि से वस्तु एवं सेवाओं के लागत मूल्य में वृद्धि हो जाती है | जिससे उत्पादित वस्तु का मूल्य में वृद्धि हो जाती है |
(vi) प्रतिबंधित प्रशासकीय कीमतें : प्रशाकीय कीमतों से तात्पर्य है प्रशासन द्वारा वस्तु एवं सेवाओं का निर्धारित मूल्य से है जिस पर नियंत्रण सरकार का होता है | जैसे - रेल भाडा, डाक व्यय, पेट्रोलियम उत्पाद की कीमतें इत्यादि |
(vii) शेष विश्व में मुद्रा स्फीति : किसी देश में कीमत स्तरों में वृद्धि देखी जाती है जब शेष विश्व में मुद्रा स्फीति चल रही हो |
मुद्रा स्फीति का प्रभाव :
(i) मुद्रा-स्फीति संवृद्धि (विकास) की प्रक्रिया में गतिरोध पैदा करता है |
(ii) इससे परियोजनाओं की लागत में वृद्धि हो जाती है |
(iii) इससे भुगतान शेष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है |
(iv) इससे उन लोगों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है जिनकी स्थिर आय है
(v) मुद्रा स्फीति से श्रमिकों की वास्तविक आय कम हो जाती है और इससे उनकी क्रय क्षमता घट जाती है |
(vi) इससे समाज में आर्थिक असमानता बढ़ने का खतरा होता है |
(vii) इससे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर प्रभाव पड़ता है |
मुद्रा-स्फीति पर नियंत्रण हेतु सरकारी द्वारा किए गए उपाय:
1. मौद्रिक नीति : मौद्रिक नीति वह नीति है जिसके द्वारा सरकार मुद्रा की पूर्ति तथा ब्याज की दर को नियंत्रित करती है |
मौद्रिक नीति के उपकरण :
(i) मुद्रा की पूर्ति पर रोक
(ii) ब्याज की दर में वृद्धि
(iii) साख की पूर्ति में कमी
2. कीमत नीति : सरकार कुछ समाज कल्याण हेतु कुछ वस्तुओं एवं सेवाओं कि कीमतों को नियंत्रित करती है | जैसे - तेल की कीमतों पर नियंत्रण तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा गरीबों तथा किसानों को लाभ पहुँचाना आदि|
3. आवश्यक वस्तुओं का आयात : कुछ वस्तुओं की कीमत बढ़ जाने पर सरकार उस वस्तु को आयात कर उसके आभाव को दूर करती है साथ ही साथ उनकी आयात शुल्क भी कम कर देती है जिससे मूल्य वृद्धि में कमी आती है | जैसे खाद्यान्न |
4. जमाखोरी पर रोक : मूल्य वृद्धि का बहुत बड़ा कारण कालाबाजारी तथा जमाखोरी है | सरकार इनको रोकने के लिए बहुत से आवश्यक कदम उठाती है और ऐसी वस्तुओं की पहचान कर उनका निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है |
5. राजकोषीय नीति में फेरबदल : सरकार सरकारी व्यय को नियंत्रित करती है तथा करों में वृद्धि करती है ताकि लोगों की कम हो जाये | परिणाम स्वरुप उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता घटती है और बढती कीमतों पर रोक लगती है |
मुद्रास्फीति की रोकथाम हेतु मौद्रिक नीति के प्रयोग:-
(i) बैंक दर में वृद्धि:- बैंक दर वह दर है जिस पर केन्द्रीय बैंक व्यापारिक बैंको को ऋण सुविधायें प्रदान करता है| मुद्रास्फीति के दिनों में केन्द्रीय बैंक बैंक-दर में वृद्धी कर देता है जिससे व्यापारिक बैंको द्वारा दिए जाने वाले ऋण पर ब्याज-दरे भी बढ़ जाती है ऋण महेंगा हो जाने पर लोग बैंको से कम ऋण लेंगे|
(ii) सरकारी प्रतिभूतियो कि बिक्री:- भारतीय रिजर्व बैंक खुले बाजार में सरकारिया प्रतिभूतिया बेच कर मुद्रास्फीति पर काबू पा सकते है मुद्रा कि पूर्ति कम हो जाने से कुछ हद तक समग्र मांग भी कम हो जाती है जिससे बढ़ते कीमत स्तर पर अंकुश लगने में मदद मिलेगी|
(iii) वैध कोश अनुपात:- व्यापारिक बैंको को अपनी कुल जमाओ का एक निश्चित अनुपात कोश के रूप में रखना पड़ता है| जिसे वैध कोश अनुपात कहेते है इससे मौद्रिक नीति के प्रयोग से अतिरिक्त मांग पर अंकुश लगाया जा सकता है |
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