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Chapter-Chapter 4. इस्लाम का उदय और विस्तार-लगभग 570-1200 ई. History class 11 in hindi Medium CBSE Notes

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Chapter-Chapter 4. इस्लाम का उदय और विस्तार-लगभग 570-1200 ई. History class 11 in hindi Medium CBSE Notes

Chapter 4. इस्लाम का उदय और विस्तार-लगभग 570-1200 ई.

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उमय्यद शासन और अब्बासी क्रांति

उमय्यदों का शासन : उमय्यद ने दमिश्क को अपना राजधानी बनाया और 90 वर्ष तक शासन किया | उमय्यद राज्य अरब में एक साम्राज्यिक शक्ति बनकर उभरा | वह सीधे इस्लाम पर आधारित नहीं था | बल्कि यह शासन शासन-कला और सीरियाई सैनिकों की वफ़ादारी के बल पर चल रहा था | फिर भी इस्लाम उमय्यद शासन को मान्यता प्रदान कर रहा था | 

उमय्यद शासन व्यवस्था की विशेषताएँ : 

(i) इसके सैनिक वफादार थे |

(ii) प्रशासन में ईसाई सलाहकार और इसके अलावा जरतुश्त लिपिक और अधिकारी भी शामिल थे।

(iii) उन्होंने अपनी अरबी सामाजिक पहचान बनाए रखी |

(iv) यह खिलाफत पर आधारित शासन नहीं था अपितु यह राजतन्त्र पर आधारित था | 

(v) उन्होंने वंशगत उतराधिकारी परंपरा की शुरुआत की |

अब्बासी क्रांति : 

उमय्यादों के शासन को अब्बासियों में दुष्टों का शासन बताया और यह दावा किया कि वे पैगम्बर मुहम्मद के मूल इस्लाम की पुनर्स्थापना करेंगे | अब्बासियों ने 'दवा' नामक एक आन्दोलन चला कर उमय्यद वंश के इस शासन को उखाड़ फेंका | इसी के साथ इस क्रांति से केवल वंश का परिवर्तन ही नहीं हुआ बल्कि इस्लाम के राजनैतिक ढाँचे और उसकी संस्कृति में भी बदलाव आये | इसे ही अब्बासी क्रांति के नाम से जाना जाता है |

अब्बासी क्रांति के कारण : 

(i) अरब सैनिक अधिकांशत: जो ईरान से आये थे और वे सीरियाई लोगों के प्रभुत्व से नाराज थे |

(ii) उमय्यादों ने अरब नागरिकों से करों में रियायतों और विशेषाधिकार देने के वायदों को पूरा नहीं किया था | 

(iii) ईरानी मुसलमानों को अपनी जातीय चेतना से ग्रस्त अरबों के तिरस्कार का शिकार होना पड़ा था जिससे वे किसी भी अभियान में शामिल होने के इक्षुक थे |

(iv) उमय्यद शासन राजतन्त्र पर आधारित शासन था |

अब्बासियों की विशेषताएँ :

अब्बासियों की निम्नलिखित विशेषताएँ थी |

(i) अब्बासी शासन के अंतर्गत अरबों के प्रभाव में गिरावट आई | इसके विपरीत ईरानी संस्कृति का महत्त्व बढ़ गया |

(ii) अब्बासियों ने अपनी राजधानी बगदाद में स्थापित किया |

(iii) प्रशासन में इराक और खुरासान की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सेना तथा नौकरशाही का गैर-कबीलाई आधार पर पुर्नगठन किया गया | 

(iv) अब्बासी शासकों ने खिलाफत की धार्मिक स्थिति तथा कार्यों को और मजबूत बनाया और इस्लामी संस्थाओं एवं विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया |

(v) अब्बासियों ने भी उमय्यादों की तरह राजतन्त्र को ही जारी रखा | 

इस्लामी जगत में नयी फारसी का विकास एवं फिरदौस का योगदान : 

गजनी साम्राज्य : 

धर्मयुद्ध : 1095 से 1291 ई० के बीच ईसाईयों और मुसलमानों के बीच कई युद्ध हुए जिसे धर्मयुद्ध के नाम से जाना जाता है | 

ये धर्मयुद्ध तीन थे : 

(1) प्रथम धर्मयुद्ध : प्रथम धर्मयुद्ध 1098 ई० और 1099 ई० में फ्रांस और इटली के सैनिकों ने सीरिया में एंटीओक तथा येरुसलम चढाई की और इन्हें जीत लिया | ईसाईयों द्वारा जेरुसलम में मुसलमानों और यहूदियों की निर्मम हत्याएँ की गई | शीघ्र ही ईसाईयों ने सीरिया-फिलस्तीन के क्षेत्र में इस धर्मयुद्ध के द्वारा चार राज्य स्थापित कर लिए | इन क्षेत्रों को सामूहिक रूप से "आउटरैमर" कहा जाता था | बाद के सभी युद्ध इसकी रक्षा और विस्तार के लिए लड़े गए | 

(2) द्वितीय धर्मयुद्ध : कुछ समय तक ही आउटरैमर प्रदेश ईसाईयों के अधीन सूरक्षित रहा | परन्तु तुर्कों ने 1144 ई० में एडेरस्सा पर अधिकार कर लिया तो पोप ने एक दूसरे धर्मयुद्ध (1145-1149) के लिए अपील की। एक जर्मन और फ्रांसिसी सेना ने दमिश्क पर कब्जा करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें हरा कर घर लौटने के लिए मजबूर कर दिया गया। इसके बाद आउटरैमर की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होती गई। धर्मयुद्ध का जोश अब खत्म हो गया और ईसाई शासकों ने विलासिता से जीना और नए-नए इलाकों के लिए लड़ाई करना शुरू कर दिया। सलाह अल-दीन (सलादीन) ने एक मिस्री-सीरियाई साम्राज्य स्थापित किया और ईसाइयों के विरुद्ध धर्मयुद्ध करने का आह्वान किया, और उन्हें 1187 में पराजित कर दिया। उसने पहले धर्मयुद्ध के लगभग एक शताब्दी बाद, जेरूसलम पर फिर से कब्जा कर लिया। उस समय के अभिलेखों से संकेत मिलता है कि ईसाई लोगों के साथ सलाह अल-दीन का व्यवहार दयामय था, जो विशेष रूप से उस तरीके के व्यवहार के विपरीत था, जैसा पहले ईसाइयों ने मुसलमानों और यहूदियों के साथ किया था।

(3) तृतीय धर्मयुद्ध : दुसरे धर्मयुद्ध में ईसाईयों से राज्य और शहर मुसलमानों द्वारा छीन जाने से 1189 में तीसरे धर्मयुद्ध के लिए प्रोत्साहन मिला, लेकिन धर्मयुद्ध करने वाले फिलिस्तीन में कुछ तटवर्ती शहरों और ईसाई तीर्थयात्रियों के लिए जेरूसलम में मुक्त रूप से प्रवेश के सिवाय और कुछ प्राप्त नहीं कर सके | मिस्र के शासकों, मामलुकों ने अंततः 1291 में धर्मयुद्ध करने वाले सभी ईसाइयों को समूचे फिलिस्तीन से बाहर निकाल दिया। धीरे-धीरे यूरोप की इस्लाम में सैनिक दिलचस्पी समाप्त हो गई और उसका ध्यान अपने आंतरिक राजनीतिक और सांस्वृफतिक विकास की ओर केन्द्रित हो गया।

धर्मयुद्धों का ईसाई-मुस्लिम संबंधों पर स्थायी प्रभाव : 

(i) मुस्लिम राज्यों का अपने ईसाई प्रजाजनों की ओर कठोर रुख, जो लड़ाइयों की कड़वी यादों और
मिली-जुली आबादी वाले इलाकों में सुरक्षा की ज़रूरतों का परिणाम था।

(ii) मुस्लिम सत्ता की बहाली के बाद भी पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार में इटली के व्यापारिक समुदायों का अधिक प्रभाव | 

धर्मयुद्ध के लिए उत्तरदायी परिस्थितियाँ : 

धर्मयुद्ध के लिए निम्नलिखित परिस्थितयाँ उत्तरदायी थी | 

(i) ईसाईयों के लिए फिलिस्तीन एक 'पवित्र भूमि' थी | यहाँ ईसाईयों के अधिकांश धार्मिक स्थल थे | जिस पर मुसलमानों का कब्ज़ा हो चूका था |

(ii) फिलिस्तीन का शहर जेरुसलम में ही ईसा मसीह को क्रूस पर लटकाया गया था तथा पुन: जीवित होने का स्थान माना जाता है | इस स्थान को लेकर मुस्लिम जगत और यूरोपीय ईसाईयों के बीच शत्रुता थी |

(iii) पादरी और योद्धा वर्ग राजनितिक स्थिरता के लिए प्रयत्नशील थे | 

(iv) मुस्लिम जगत के प्रति शत्रुता ग्याहरवीं शताब्दी में और अधिक स्पष्ट हो गई। नार्मनों, हंगरीवासियों और कुछ स्लाव लोगों को ईसाई बना लिया गया था और अब केवल मुसलमान मुख्य शत्रु रह गए थे।

(v) ईश्वरीय शांति आंदोलन ने सामंती समाज की आक्रमणकारी प्रवृत्तियों को ईसाई जगत से हटा कर ईश्वर के ‘शत्रुओं’ की ओर मोड़ दिया। इससे एक ऐसे वातावरण का निर्माण हो गया, जिसमें अविश्वासियों (विधर्मियों( के खिलाफ लड़ाई न केवल उचित अपितु प्रशंसनीय समझी जाने लगी।

(vi) 1095 में, पोप ने बाइन्ज़ेन्टाइन सम्राट के साथ मिलकर पुण्य देश (होली लैंड) को मुक्त कराने के लिए ईश्वर के नाम पर युद्ध के लिए आह्वान किया | 

मध्यकालीन इस्लामी जगत में शहरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ :

(i) मध्यकालीन इस्लामी जगत में शहरों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई | परिणामस्वरूप इस्लामी सभ्यता बहुत तेजी से फली-फूली और और भी नए शहरों का निर्माण हुआ | नए नए जगहों को नयी राजधानियों बनाई गई |

(ii) शहर के केंद्र में दो भवन-समूह होते थे, जहाँ से सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति का प्रसारण
होता था: उनमें एक मस्जिद (मस्जिद अल-जामी) होती थी जहाँ सामूहिक नमाज पढ़ी जाती
थी। यह इतनी बड़ी होती थी कि दूर से दिखाई दे सकती थी। दूसरा भवन-समूह केन्द्रीय मंडी (सुक) था, जिसमें दुकानों की कतारें होती थीं, व्यापारियों के आवास (फंदुक) और सर्राफा कार्यालय होता था।

(iii) शहर प्रशासकों (जो राज्य के आयन अथवा नेत्र थे) और विद्वानों और व्यापारियों (तुज्जर) के लिए घर होते थे, जो केद्र के निकट रहते थे।

(iv) सामान्य नागरिकों और सैनिकों के रहने के क्वार्टर बाहरी घेरे में होते थे, और प्रत्येक में अपनी मस्जिद, गिरजाघर अथवा सिनेगोग (यहूदी प्रार्थनाघर), छोटी मंडी और सार्वजनिक स्नानघर (हमाम) और एक महत्त्वपूर्ण सभा-स्थल होता था। 

(v) शहर के बाहरी इलाकों में शहरी गरीबों के मकान, देहातों से लाई जाने वाली हरी सब्जियों और फलों के लिए बाजार, काफिलों के ठिकाने और ‘अस्वच्छ’ दुकानें, जैसे चमड़ा साफ करने या रँगने की दुकानें और कसाई की दुकानें होती थीं। 

(vi) शहर की दीवारों के बाहर कब्रिस्तान और सराय होते थे। सराय में लोग उस समय आराम कर सकते थे जब शहर के दरवाजे बंद कर दिए गए हों। सभी शहरों का नक्शा एक जैसा नहीं होता था, इस नक्शे में परिदृश्य, राजनीतिक परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं के आधर पर परिवर्तन किए जा सकते थे। 

 

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