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CBSE Notes for Class 9 History hindi Medium 1. फ़्रांसिसी क्रांति

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CBSE NotesClass 9th History Chapter 1. फ़्रांसिसी क्रांति:
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1. फ़्रांसिसी क्रांति

 

नेपोलियन का उदय

 

फ्रांसीसी क्रांति: 


क्रन्तिकारी सरकार (जैकोबिन सरकार) द्वारा महिलाओं की दशा में सुधार के लिए किया गया कार्य: 

(i) सरकारी विद्यालयों की स्थापना के साथ ही सभी लड़कियों के लिए स्कूली शिक्षा अनिवार्य बना दिया गया | 

(ii) पिता उनके मर्जी के खिलाफ शादी के लिए बाध्य नहीं कर सकते थे | 

(iii) शादी को स्वैच्छिक अनुबंध माना गया और नागरिक कानूनों के तहत उनका पंजीकरण किया जाने लगा | 

(iv) इस कानून में तलाक को क़ानूनी रूप दे दिया गया | 

(v) इस कानून के अनुसार महिलाएं अब व्यावसायिक प्रशिक्षण ले सकती थी, कलाकार बन सकती थी और छोटे-मोटे व्यवसाय चला सकती थी |  

जैकोबिन सरकार का क्रन्तिकारी सामाजिक सुधार : 

(i) दास प्रथा का उन्मूलन जैसे सुधार प्रमुख थे | 

(ii) महिलाओं के जीवन में सुधार और उनके शिक्षा और व्यवसाय कार्य में सुधार किये गए |

डिरेक्ट्री या डायरेक्टरी : जैकोबिन सरकार के पतन के बाद फ्रांस के नए संविधान में दो चुनी हुई परिषदों का प्रावधान किया गया | ये परिषद् पाँच सदस्यों वाली एक कार्यपालिका की नियुक्ति किया जिसे डिरेक्टरी या डिरेक्ट्री कहते है |

फ्रांस सरकार के स्वरुप में तीन प्रेरक आदर्श :

(i) स्वतंत्रता

(ii) विधिसम्मत समानता और

(iii) बंधुत्व फ्रांस सरकार के स्वरुप में तीन मूल्य थे जो प्रेरक आदर्श थे और फ्रांस ही नहीं बाकि यूरोप के राजनितिक आन्दोलन को भी प्रेरित किया | 

फ्रांसिसी क्रांति के दौरान जैकोबिन क्लब के सदस्यों के द्वारा अपनाए गए परिधानों की शैली :

जैकोबिनों के एक बड़े वर्ग ने गोदी कामगारों की तरह धारीदार लंबी पतलून पहनने का निर्णय किया। ऐसा उन्होंने समाज के फैशनपरस्त वर्ग, खासतौर से घुटने तक पहने जाने वाले ब्रीचेस पहनने वाले कुलीनों से खुद को अलग करने के लिए किया। यह ब्रीचेस पहनने वाले कुलीनों की सत्ता समाप्ति के एलान का उनका तरीका था।

इसलिए जैकोबिनों को ‘सौं कुलॉत’ के नाम से जाना गया जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - बिना घुटन्ने वाले। सौं कुलॉत पुरुष लाल रंग की टोपी भी पहनते थे जो स्वतंत्रता का प्रतीक थी लेकिन महिलाओं को ऐसा करने की अनुमति नहीं थी।

अंतिम रूप से दास प्रथा का उन्मुलन :

नैशनल असेंबली में लंबी बहस हुई कि व्यक्ति के मूलभूत अधिकार उपनिवेशों में रहने वाली प्रजा सहित समस्त फ्रांसिसी प्रजा को प्रदान किए जाएँ या नहीं। परन्तु दास-व्यापार पर निर्भर व्यापारियों के विरोध के भय से नैशनल असेंबली में कोई कानून पारित नहीं किया गया। अंतिम रूप से दास प्रथा का उन्मुलन 1848 में किया गया | 

सेंसरशिप की समाप्ति का परिणाम: 

बास्तील के विध्वंस के बाद सन् 1789 की गर्मियों में जो सबसे महत्त्वपूर्ण कानून अस्तित्व में आया, वह था - सेंसरशिप की समाप्ति। प्राचीन राजतंत्र के अंतर्गत तमाम लिखित सामग्री और सांस्कृतिक गतिविधियों--किताब, अखबार, नाटक--को राजा के सेंसर अधिकारियों द्वारा पास किए जाने के बाद ही प्रकाशित या मंचित किया जा सकता था। परंतु अब अधिकारों के घोषणापत्रा ने भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता को नैसर्गिक अधिकार घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप फ्रांस के शहरों में अखबारों, पर्चों, पुस्तकों एवं छपी हुई तस्वीरों की बाढ़ आ गई जहाँ से वह तेशी से गाँव-देहात तक जा पहुँची।

नेपोलियन का व्यक्तित्व: नेपोलियन बोनापार्ट की गिनती विश्व के महान् सेनापतियों में की जाती है।वह बहुत परिश्रमी, इरादे का पक्का, तलवार का धनी और बहुत वीर सैनिक था । जब पहली बार उसे इटली में फ्रांस की सेना का कमाण्डर बनाकर भेजा गया तो उसने अपनी मधुर वाणी से सैनिको में एक अदभुद जोश भर दिया । बुरी दशाओं और संधर्षो में भी सैनिक उसका साथ देते थें । असंभव शब्द उसके शब्दकोष में नहीं था । वह एक महान सेनापति ही नहीं बल्की एक कुशल राजनितिज्ञ और शासक भी था।  

 

नेपोलियन का उदय : नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म 1769 ई0 में रोम सागर के द्वीप कोर्सिका की राजधानी अजासियों में हुआ था। वह असधारण प्रतिभा का स्वामी था । उसने पेरिस के फौजी स्कुल में शिक्षा प्राप्त कर सेना में भर्ती हुआ और असीम वीरता, साहस और सैनिक योग्यता द्वारा उन्नति कर सेनापति बन गया । उसने ब्रिटेन, आस्ट्रिया और सार्डीनिया के विरूद्ध विजय प्राप्त की । तत्पश्चात् वह डायरेक्टरी का प्रथम बना और थोडे समय में ही वह फ्रांस का सम्राट बन गया । उसने अपनी योग्यता और कुशलता से फ्रांस में शांति व्यवस्था स्थापित की । 

नेपोलियन की मृत्यु : नेपोलियन बोनापार्ट बहुत ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति था उसने दूसरे युरोपियन देशो पर विजय प्राप्त करने के लिए आक्रमण कर दिया परन्तु 1815 में वाटर लु के युद्ध में उसे हार का मुँह देखना पडा । उसे बंदी बनाकर सेन्ट हेलना द्वीप में भेज दिया गया जहाँ 1821 ई0 में उसकी मृत्यु हो गई । यह फ्रांस के एक परम् वीर योद्धा का दुःखद अंत था ।

 

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